Tuesday, 12 August 2014

राजजात या नन्दाजात देवी नन्दा की अपने मैत (मायके) से एक सजीं संवरी दुल्हन के रुप में ससुराल जाने की यात्रा है।



नंदादेवी राजजात नंदादेवी राजजात उत्तराखंड की एक ऐसी ऐतिहासिक धरोहर है, जो भूमि की सांस्कृतिक विरासत की महक चारों ओर बिखेर देती है। जात का अर्थ होता है देवयात्रा, अतः नंदा राजजात का अर्थ है राज राजेश्वरी नंदादेवी की यात्रा। यह यात्रा इष्ट देव भूमि में मानव और देवताओं के संबंधो की अनूठी दास्तान है। यह यात्रा पहाड़ के कठोर जीवन का आइना है तो पहाड़ी में ध्याणी (विवाहित बेटी-बहन) के संघर्षों की कहानी भी है।


राजजात या नन्दाजात देवी नन्दा की अपने मैत (मायके) से एक सजीं संवरी दुल्हन के रुप में ससुराल जाने की यात्रा है। ससुराल को स्थानीय भाषा में सौरास कहते हैं। इस अवसर पर नन्दादेवी को सजाकर डोली में बिठाकर एवं वस्र,आभूषण, खाद्यान्न, कलेवा, दूज, दहेज आदि उपहार देकर पारम्परिक की विदाई की तरह विदा किया जाता है।
इस यात्रा में लगभग 280 किलोमीटर की दूरी, नौटी से होमकुण्ड तक,पैदल करनी पड़ती है। इस दौरान घने जंगलों पथरीले मार्गों, दुर्गम चोटियों और बर्फीले पहाड़ों को पार करना पड़ता है।यात्रा की कठिनता और दुरुहता का अंदाज इसी बात से लगाया जा सकता है कि बाणगांव से आगे रिणकीधार से यात्रियों को नंगे पांव चलकर लगभग 17000 फीट की ऊँचाई पार करनी पड़ती है।रिणकीधार से आगे यात्रा में काफी प्रतिबन्ध भी है जैसे स्रियाँ, बच्चे, गाजे-बाजे, इत्यादि निसिद्ध है।

सम्भवत :- यह विश्व की सबसे लम्बी, दुर्गम ओर कठिन धर्मयात्रा है।इसे केवल समर्पित एवं निष्ठावान व्यक्ति ही कर सकते हैं।हजारों श्रद्धालु आज भी इस यात्रा को पूरा करते हैं |
लोक इतिहास के अनुसार नंदा गढ़वाल के राजाओं के साथ-साथ कुंमाऊ के कत्युरी राजवंश की इष्टदेवी थी। इष्टदेवी होने के कारण नंदादेवी को राजराजेश्वरी कहकर संबोधित किया जाता है। नंदादेवी को पार्वती की बहन के रूप में देखा जाता है परंतु कहीं-कहीं नंदादेवी को ही पार्वती का रूप माना गया है। नंदा के अनेक नामों में प्रमुख हैं शिवा, सुनन्दा, शुभानन्दा, नन्दिनी। पूरे उत्तरांचल में समान रूप से पूजे जाने के कारण नंदादेवी को समस्त प्रदेश में धार्मिक एकता के सूत्र के रूप में देखा जाता है। रूपकुंड के नरकंकाल, बगुवावासा में स्थित आठवीं सदी की सिद्धि विनायक भगवान गणेश की काले पत्थर की मूर्ति आदि इस यात्रा की ऐतिहासिकता को सिद्ध करते हैं, साथ ही गढ़वाल के परंपरागत नंदा जागरी (नंदादेवी की गाथा गाने वाले) भी इस यात्रा की कहानी को बयां करते हैं।
 राजजात की शुरूआत आठवीं सदी के आसपास हुई बताई जाती है। यह वह काल था जब आदिगुरु शंकराचार्य ने देश के चारों कोनों में चार पीठों की स्थापना की थी। लोक इतिहास के अनुसार नंदा गढ़वाल के राजाओं के साथ-साथ कुंमाऊ के कत्युरी राजवंश की इष्टदेवी थी। इष्टदेवी होने के कारण नंदादेवी को राजराजेश्वरी कहकर संबोधित किया जाता है। नंदादेवी को पार्वती की बहन के रूप में देखा जाता है परंतु कहीं-कहीं नंदादेवी को ही पार्वती का रूप माना गया है। नंदा के अनेक नामों में प्रमुख हैं शिवा, सुनन्दा, शुभानन्दा, नन्दिनी। पूरे उत्तरांचल में समान रूप से पूजे जाने के कारण नंदादेवी को समस्त प्रदेश में धार्मिक एकता के सूत्र के रूप में देखा जाता है। रूपकुंड के नरकंकाल, बगुवावासा में स्थित आठवीं सदी की सिद्धि विनायक भगवान गणेश की काले पत्थर की मूर्ति आदि इस यात्रा की ऐतिहासिकता को सिद्ध करते हैं, साथ ही गढ़वाल के परंपरागत नंदा जागरी (नंदादेवी की गाथा गाने वाले) भी इस यात्रा की कहानी को बयां करते हैं।

नंदादेवी से जुड़ी जात (यात्रा) दो प्रकार की हैं। वार्षिक जात और राजजात। वार्षिक जात प्रतिवर्ष अगस्त-सितंबर माह में होती है जो कुरूड़ के नंदा मंदिर से शुरू होकर वेदनी कुंड तक जाती है और फिर लौट आती है, लेकिन राजजात 12 वर्ष या उससे अधिक समयांतराल में होती है। मान्यता के अनुसार देवी की यह ऐतिहासिक यात्रा चमोली के नौटीगांव से शुरू होती है और कुरूड़ के मंदिर से भी दशोली और बधाड़ की डोलियां राजजात के लिए निकलती हैं। नौटी से होमकुंड तक की लगभग 250 किलोमीटर की दूरी की यह यात्रा पैदल करनी पड़ती है। इस दौरान घने जंगलों, पथरीले मार्गों, दुर्गम चोटियों और बर्फीले पहाड़ों को पार करना पड़ता है। अलग-अलग रास्तों से ये डोलियां यात्रा में मिलती है। इसके अलावा गांव-गांव से डोलियां और छतौलियां भी इस यात्रा में शामिल होती है।

 कुमाऊं (कुमांयू) से भी अल्मोड़ा, कटारमल और नैनीताल से डोलियां नंदकेशरी में आकर राजजात में शामिल होती है। नौटी से शुरू हुई इस यात्रा का दूसरा पड़ाव इड़ा-बधाणीं है। फिर यात्रा लौटकर नौटी आती है। इसके बाद कासुंवा, सेम, कोटी, भगौती, कुलसारी, चैपड़ों, लोहाजंग, वाण, बेदनी, पातर नचैणियां से विश्व-विख्यात रूपकुंड, शिला-समुद्र, होमकुंड से चनण्याॅघट (चंदिन्याघाट), सुतोल से घाट होते हुए नन्दप्रयाग और फिर नौटी आकर यात्रा का चक्र पूरा होता है। यह दूरी करीब 280 किमी. है। इस राजजात में चैसिंग्या खाडू (चार सींगों वाला भेड़) भी शामिल किया जाता है जो कि स्थानीय क्षेत्र में राजजात का समय आने के पूर्व ही पैदा हो जाता है। उसकी पीठ पर रखे गये दोतरफा थैले में श्रद्धालु गहने, शंृगार-सामग्री व अन्य हल्की भैंट देवी के लिए रखते हैं, जो कि होमकुंड में पूजा होने के बाद आगे हिमालय की ओर प्रस्थान कर लेता है। लोगों की मान्यता है कि चैसिंग्या खाडू आगे बिकट हिमालय में जाकर लुप्त हो जाता है व नंदादेवी के क्षेत्र कैलाश में प्रवेश कर जाता है।

 वर्ष 2000 में इस राजजात को व्यापक प्रचार मिला और देश-विदेश के हजारों लोग इसमें शामिल हुए थे। राजजात उत्तराखंड की समग्र संस्कृति को प्रस्तुत करता है। इसी लिये 26 जनवरी 2005 को उत्तरांचल राज्य की झांकी राजजात पर निकाली गई थी। पिछले कुछ वर्षों से पर्यटन विभाग द्वारा रूपकुंड महोत्सव का आयोजन भी किया जा रहा है। स्थानीय लोगों ने इस यात्रा के सफल संचालन हेतु श्री नंदादेवी राजजात समिति का गठन भी किया है। इस सीमिति के तत्वावधान में नंदादेवी राजजात का आयोजन किया जाता है।

परंपरा के अनुसार वसंत पंचमी के दिन यात्रा के आयोजन की घोषणा की जाती है। इसके पश्चात इसकी तैयारियों का सिलसिला आरंभ होता है। इसमें नौटी के नौटियाल एवं कासुवा के कुवरों के अलावा अन्य संबंधित पक्षों जैसे बधाण के 14 सयाने, चान्दपुर के 12 थोकी ब्राह्मण तथा अन्य पुजारियों के साथ-साथ जिला प्रशासन तथा केंद्र एवं राज्य सरकार के विभिन्न विभागों द्वारा मिलकर कार्यक्रम की रूपरेखा तैयार कर यात्रा का निर्धारण किया जाता है।  

मान्यताओं के अनुसार राजजात तब होती है जब देवी का दोष (प्रकोप) लगने के लक्षण दिखाई देते हैं। ध्याणी (विवाहित बेटी-बहन) भूमिया देवी ऊफराई की पूजा करती है इसे मौड़वी कहा जाता है। ध्याणीयां यात्रा निकालती है, जिसे डोल जातरा कहा जाता है। कासुंआ के कुंवर (राज वंशज) नौटी गांव जाकर राजजात की मनौती करते हैं। कुंवर रिंगाल की छतोली (छतरी) और चैसिंग्या खाडू (चार सींगों वाला भेड़) लेकर आते हैं। चैसिंगा खाडू का जन्म लेना राजजात की एक खास बात है। नौटियाल और कुंवर लोग नंदा के उपहार को चैसिंग खाडू की पीठ पर होमकुंड तक ले जाते हैं। वहां से खाडू अकेला ही आगे बढ़ जाता है। खाडू के जन्म के साथ ही विचित्र चमत्कारिक घटनायें शुरू हो जाती है। जिस गौशाला में यह जन्म लेता है उसी दिन से वहां शेर आना प्रारंभ कर देता है और जब तक खाडू का मालिक उसे राजजात को अर्पित करने की मनौती नहीं रखता तब तक शेर लगातार आता ही रहता है।

Saturday, 9 August 2014

रक्षाबंधन को उत्तरांचल का श्रावणी कहते हैं

                        चंदन का टीका रेशम का धागा; सावन की सुगंध बारिश की फुहार; भाई की उम्मीद बहना का प्यार;

                             मुबारक हो आपको “”रक्षा-बंधन”” का त्योहार ।



रक्षाबंधन को उत्तरांचल का श्रावणी कहते हैं । इस दिन यजुर्वेदी द्विजों का उपकर्म होता है तथा उत्सर्जन, स्नान विधि, ऋषि-तर्पणादि करके नया यज्ञोपवीत धारण करते हैं । यह ब्राह्मणों का सर्वोपरि त्यौहार माना जाता है । ब्राह्मण अपने यजमानों को यज्ञोपवीत तथा राखी देकर दक्षिणा लेते हैं । विख्यात अमरनाथ यात्रा गुरूपूर्णिमा से प्रारंभ होकर रक्षाबंधन के दिन संपूर्ण होती है । प्रचलित कहावत है कि इसी दिन हिमानी शिवलिंग इसी दिन पूर्ण आकार ग्रहण करता है व इस उपलक्ष्य में अमरनाथ गुफा में प्रत्येक वर्ष मेला भी लगता है ।

महाराष्ट्र राज्य में यह त्यौहार नारियल पूर्णिमा या श्रावणी के नाम से मशहूर है । इस दिन लोग समुद्रतट या नदी के किनारे अपने जनेऊ बदलते हैं और समुद्र या नदी की पूजा, अराधना करते हैं । इस मौके पर समुद्र के स्वामी वरूण देवता को प्रसन्‍न करने के लिए नारियल चढ़ाने की परंपरा के कारण रक्षाबंधन के दिन मुंबई के समुद्र तट नारियलों से भर जाते हैं ।

राजस्थान में रामराखी और चूड़ाराखी अथवा लूंबा बांधने का प्रचलन है । रामराखी सामान्य राखी से अलग होता है जिसमें लाल डोरे पर एक पीले छीटों वाला फुदना लगा होता है, जिसे केवल भगवान को ही बाँधा जाता है । चूड़ा राखी भाभियों की चूड़ियों की शोभा बढ़ाती है । जोधपुर में राखी के दिन केवल राखी ही नहीं बाँधी जाती है, बल्कि दोपहर में पद्मसर और मिनकानाडी पर गोबर, मिट्टी और भस्मी से स्नाकर शरीर को शुद्ध किया जाता है । इसके बाद धर्म तथा वेदों के प्रवचनकर्त्ता अंरूधती, गणपति, दुर्गा, गोमिला तथा सप्तर्षियों के दर्भ के पूजास्थल बनाकर मंत्रोच्चारण के साथ पूजा की जाती है एवं उनका तर्पण कर पितृऋण चुकाया जाता है । धार्मिक अनुष्ठान करने के बाद घर आकर हवन किया जाता है तथा वहीं रेशमी डोरे से राखी बनाकर कच्चे दूध से अभिमंत्रित करने के उपरान्त भोजन किया जाता है ।

तमिलनाडु, केरल, महाराष्ट्र और उड़ीसा के दक्षिण भारतीय ब्राह्मण इस पर्व को अवनि अक्‍तिम कहते हैं । यज्ञोपवीतधारी ब्राह्मण इस दिन नदी या समुद्र तट पर स्नादि के बाद ऋषियों का तर्पण कर नया यशोपवीत धारण किया जाता है । विगत वर्षों के पुराने पापों को पुराने यज्ञोपवीत की तरह त्याग देने और स्वच्छ नया यज्ञोपवीत की तरह नए जीवन की शुरूआत करने की प्रतिज्ञा ली जाती है । इस दिन यजुर्वेदीय ब्राह्मण 6 मास के लिए वेद अध्ययन प्रारंभ करते हैं । इस पर्व का एक नाम उपक्रमण भी है जिसका अर्थ है- नई शुरूआत । व्रत में हरियाली तीज (श्रावण शुक्ल तृतीया) से श्रावणी पूर्णिमा तक सभी मंदिरों तथा घरों में ठाकुर झूले में विराजमान होते हैं और रक्षाबंधन वाले दिन झूलन दर्शन समाप्त होते हैं ।

खटीमा, उत्तरांचल (वार्ता) : रक्षाबंधन के दिन जहां एक तरफ बहनें अपने भाइयों की कलाई पर राखी बांध उनकी सलामती की दुआएं मांगती हैं, वहीं उत्तरांचल के चंपावत जिले में देवीधुरा स्थित मंदिर के प्रांगण में हर साल सैकड़ों योद्धा इन्हीं राखी बंधे हाथों से एक-दूसरे पर पत्थरों से हमला करते हैं। महापाषाण काल से ही यह युद्ध हर साल सिर्फ रक्षाबंधन के दिन होता है।

किंवदंती के अनुसार, महापाषाण काल के दौरान देवताओं के गणों को प्रसन्न रखने के लिए उन्हें नरबलि देने के प्रावधान से बचने के लिए बताये गए उपाय के तहत ही यह प्रथा आज भी यहां जारी है। उत्तरांचल के कुमाऊं में चंपावत जिले के पंचायत उपाध्यक्ष बहादुर सिंह पाटनी ने बताया कि चंपावत जिला प्रशासन को देश और विदेश से कई पर्यटकों के 'पत्थर युद्ध' देखने आने की खबर मिली है।

Thursday, 7 August 2014

मेरे गाँव की गलियां कहती हैं-कभी हमसे भी मिलने आया करो

  

             मेरे गाँव की गलियां कहती हैं कभी हमसे भी मिलने आया करो


मेरे गाँव की गलियां कहती हैं
कभी हमसे भी मिलने आया करो
इस मिट्टी में तुमने जन्म लिया
कभी इस मिट्टी से भी मिल के जाया करो
ये खेत, चौपाल, पनघट के रस्ते
बैल, जोहड़, लकड़ी की तख्ती
और खेल तुम्हारे सब बचपन के
कब से रस्ता देख रहे हैं
कभी याद इन्हे कर मुस्काया करो
कभी इनसे भी मिलने आया करो
जोहड़ के किनारे का पीपल कब से इस आस में बैठा है
तुम फ़िर कब उसके पतों की फिरकी को बना के दौडोगे
बरगद भी बाट में बुढा हुआ उसकी दाढी भी गहरी हुई
उसके पतों की खड-खड में जैसे विरह वेदना ठहरी हुई
ये सब तो यादों को संजोयें हैं
तेरी याद में कितना रोये हैं
अपने बचपन के मित्रों के लिए तनिक
दो अश्रु तुम भी बहाया करो
इसी मिटटी से हो गढे गए, रहते थे इसी में सने हुए
खेला करते थे देर दुपहर, गिर गिर कर इसी में खड़े हुए
जाने अब क्यों हमसे रूठे हो
दूर जो इतना जा बैठे हो
क्या आने की भी चाह नही
क्या उठती कभी दिल से आह नही
आ जाओ की आँगन सुना है,
नही अब लगती कोई किलकारी है
तुम बिन इस घर में
सन्नाटे का दांव भारी है
तुम तो इन सब के प्यारे थे, क्या तुमको न याद सताती है
या समय की लम्बी अवधी ने यादों को नींद दिला दी है
जिस मिटटी के चूल्हे पर पूरे कुनबे की रोटी सिकती थी
अब राख के नीचे कोने में इक याद सिलगती रहती है
इक इक कर सब आँगन से उठ चले गए
अबके बरस इन जाडों में बूढी दादी की बारी लगती है
क्या अब मिलने के लिए दो घड़ी भी भारी लगती हैं
जब छत की मुंडेरों से तुम नीचे झाँका करते थे
दादी पर फ़िर चुपके से हौले से कंकर मारा करते थे
डंडा लेकर दादी फ़िर पीछे दौड़ा करती थी
तुम्हारी इस शैतानी में मासूमी झलका करती थी
मुंडेरों की इंटें अब गल कर गिरने को हैं
नीर लिए अंखियों में जम के शिकायत भरने को हैं
क्या इनकी मायूसी भरी शिकायक की भी तुम्हे कोई परवाह नही
फौजी चाचा की चिट्ठी को चाव से पढ़ के सुनाते थे
फ़िर फ़ौरन जवाब लिखने को दौड़ के लिफाफा लाते थे
ख़तम हुए वो दौर भी अब तो
डाकिये की भी आमद ख़तम हुई
तेरी चिट्ठी की आहट सुनने को
दरवाजे की कुण्डी के कान रह रह कर जागा करते हैं
मेरे गाँव की गलियां कहती हैं
कभी हमसे भी मिलने आया करो ....

Wednesday, 6 August 2014

पुत्रदायिनी है माँ अनुसूया देवी - पृथ्वी पर ही नहीं वरन देवलोक में भी उनके सत्तित्व को देवगण सम्मान देते हैं - चमोली


देवी अनुसूया महर्षि अत्रि की पत्नी थी ! अनुसूया जिसका अर्थ किसी से भी इर्ष्या भाव न रखना उनके चरित्र को सार्थक करता हैं ! देवी अनुसूया का नाम पतिव्रता स्त्रियों में सर्वप्रथम श्रेणी में रखा जाता हैं!
पृथ्वी पर ही नहीं वरन देवलोक में भी उनके सत्तित्व को देवगण सम्मान देते हैं ! कहा जाता हैं उनके सतित्त्व की परीक्षा स्वयं त्रिदेव ब्रह्मा विष्णु और महेश ने ली थी !

देवी अनुसूया महर्षि कर्दम की पुत्री थी और इनकी माता का नाम देवहुति था ! इनका विवाह ब्रह्मा जी के मानस पुत्र महर्षि अत्रि से हुआ था और विवाह के पश्चात् अपने सेवा भाव तथा धर्मपरायणता से इन्होने महर्षि अत्रि का ह्रदय जीत लिया ! इनके  में यह भी कहा जाता हैं कि सम्पूर्ण भारतवर्ष में इनका नाम पतिव्रता स्त्रियों तथा धर्म परायणता में सबसे ऊपर और विशिष्ट हैं!वनवास के समय जब श्री राम, सीता  और लक्ष्मण सहित जब महर्षि अत्रि के आश्रम पहुचे तो देवी अनुसूया ने माता सीता को पति धर्म की सम्पूर्ण शिक्षा प्रदान दी थी !

जब ब्रह्मा, विष्णु और महेश ने इनके सतीत्व की परीक्षा ली थी तब उनके सतित्त्व से प्रसन्न होकर उन्होंने इन्हें आशीर्वाद प्रदान किया था कि वे तीनो स्वयं उनके पुत्र के रूप में उनके गर्भ से जन्म लेंगे! ब्रह्मा के रूप में सोम, विष्णु के रूप दत्तात्रेय और महेश के रूप में दुर्वासा उनके पुत्र हुए !
गोपेश्वर। पुराणों में मां अनुसूया को सती शिरोमणि का दर्जा प्राप्त है। अनसूया मंदिर के निकट अनसूया आश्रम में त्रिदेवों (ब्रह्मा, विष्णु व महेश) ने अनुसूया माता के सतीत्व की परीक्षा ली थी।

देवी अनुसूया देवी की त्रिदेव द्वारा परीक्षा

 त्रि देवों की देवी अनुसूया की पतिव्रता की यह कथा श्री मदभगवत में भी वर्णित हैं ! जिसके अनुसार त्रिदेवों ने सन्यासियों का भेष बना देवी अनुसूया के आश्रम पर पहुचे !उस समय महर्षि अत्रि किसी कारणवश आश्रम में उपस्थित नहीं थे !जब सन्यासियों को देवी अनुसूया ने आश्रम में देखा तो उनका आदर सत्कार करना चाहा पर सन्यासी बने हुए त्रि देवों ने आतिथ्य को अस्वीकार कर दिया !

देवी अनुसूया इससे बहुत दुखी हुई और उन्होंने आतिथ्य अस्वीकार करने का कारण सन्यासियों से पूछा !
तब सन्यासियों ने देवी अनुसूया से कहा कि वे उन्हें निर्वाण भिक्षा प्रदान करे - निर्वाण भिक्षा अर्थात बिना किसी वस्त्र के उन्हें भिक्षा दे ! तभी वे उनका आतिथ्य स्वीकार करेंगे !

 देवी अनुसूया यह सुनकर धर्म संकट में पड़ गई ! यह उनके सतित्त्व धर्म के विरुद्ध था लेकिन द्वार पड़ आये अतिथि को लौटना भी उनके कर्तव्य परायणता के विरुद्ध था और भगवान् को रुष्ट करना था!
देवी अनुसूया अपने पतिव्रता की धर्म में रोज महर्षि अत्रि के चरणों को जल से धोती और उसे अपना आश्रय में रखती थी ! इस प्रकार अपने पति अथवा गुरु के चरणों को धोकर वह जल पथ पूजा के लिए रख लेती थी और इस प्रकार जो जल वह रखती थी वह चरणामृत एक पवित्र जल था जिसे उन्होंने अपने सतित्त्व को बचाने के लिए अपने पतिव्रत धर्म को याद कर मन में संकल्प किया कि यदि आज तक कभी मैंने अपने पति के अतिरिक्त किसी अन्य पुरुष का चिंतन व् काम भाव से मनन न किया हो तो अभी ये तीनो सन्यासी छः - २ माह के बच्चे में परिवर्तित हो जाए ! और वह चरनामृत उन सन्यासियों पर छिड़क दिया !
जैसे ही उन्होंने जल का छिडकाव उन सन्यासियों के ऊपर किया वे सभी छः माह के शिशुओं में परिवर्तित हो गए !इस प्रकार उसी समय, मातृत्त्व भाव से वशीभूत होकर, छः माह के शिशुओं में परिवर्तित त्रिदेवों को देवी अनुसूया ने निर्वाण भिक्षा में पुत्र बना कर उन्हें स्तनपान करा वात्सल्य प्रेम से भाव विभोर कर दिया!

 देवी अनुसूया ने महर्षि अत्रि के आने का इन्तजार करने लगी कि ये घटना वे उन्हें बतायेंगी पर अपने दिव्य दृष्टी से महर्षि अत्रि यह घटना जान चुके थे और आकर उन्होंने बालक बने त्रिदेवों को अपने गले से लगा लिया! इधर त्रिदेवों को वापस लौटते न देख त्रिदेवियाँ भी चित्रकूट के महर्षि अत्रि के आश्रम में पहुच गई ! वहां अपने पतियों को छह माह के शिशुओं के रूप में देख वह सभी  देवी अनुसूया के पतिव्रत से बहुत प्रसन्न हुई लेकिन अपने पतियों को पुनः उनके वास्तविक रूप में पाना तभी संभव था जबकि देवी अनुसूया से स्वयं वे पति भिक्षा मांगती ! तब त्रि देवियों ने देवी अनुसूया से अपने २ पति को वास्तविक रूप में पाने के लिए देवी अनुसूया से प्रार्थना की और पति भिक्षा मांगी ! देवी अनुसूया ने महा देवियों को वरदान में उनके पति का वास्तविक रूप प्रदान किया! तब त्रिदेव अपने वास्तविक रूप में आये और उन्होंने  देवी अनुसूया के सतीत्व और पतिव्रत से प्रसन्न हो उन्हें आशीर्वाद और वरदान दिया कि उनके तीन पुत्र होंगे जो की त्रिदेव के समान ही होंगे !

इस प्रकार देवी अनुसूया के तीन पुत्रों में ब्रह्मा जी के वरदान से सोम, विष्णु से दत्तात्रेय और महेश से दुर्वाषा जी का जन्म हुआ !

  मान्यता के अनुसार एक बार महर्षि नारद ने त्रिदेवियों (सरस्वती, लक्ष्मी व पार्वती) से कहा कि तीनों लोकों में अनसूया से बढ़कर कोई सती नहीं है। नारद मुनि की बात सुनकर त्रिदेवियों ने त्रिदेवों को अनसूया के सतीत्व की परीक्षा लेने के लिए मृत्युलोक भेजा। तीनों देवता अनसूया आश्रम में साधु वेष में आए और मां अनसूया से नग्नावस्था में भोजन करवाने को कहा। साधुओं को बिना भोजन कराये सती मां वापस भी नहीं भेज सकती थी। तब मां अनुसूया ने अपने पति अत्रि ऋषि के कमंडल से तीनों देवों पर जल छिड़ककर उन्हें शिशु रूप में परिवर्तित कर दिया और स्तनपान कराया। कई सौ सालों तक जब तीनों देव अपने स्थानों पर नहीं पहुंचे तो चिंतित होकर तीनों देवियां अनसूया आश्रम पहुंची तथा मां अनुसूया से क्षमा याचना कर तीनों देवों को उनके मूल स्वरूप में प्रकट करवाया। तब से इस स्थान पर सती मां अनसूया को पुत्रदायिनी के रूप में पूजा जाता है। मार्गशीष पूर्णिमा को प्रत्येक वर्ष दत्तात्रेय जयंती पर यहां दो दिन विशाल मेला भी लगता है। रक्षाबंधन को यहां ऋषितर्पणी मेला लगता है।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि-

प्राचीन काल में यहां पर देवी अनुसूया का छोटा सा मंदिर था। सत्रहवीं सदी में कत्यूरी राजाओं ने इस स्थान पर अनुसूया देवी के भव्य मंदिर का निर्माण किया था, मगर अठारहवीं सदी में विनाशकारी भूकंप से यह मंदिर ध्वस्त हो गया था। बाद में संत ऐत्वारगिरी महाराज ने निंगोल गधेरे व मैनागाड़ गधेरे के बीच के क्षेत्र के ग्रामीणों की मदद से इस मंदिर का निर्माण कराया। मंदिर स्थानीय पत्थरों से बनाया गया है।

सामयिकता
- नवरात्र में अनसूया देवी के मंदिर में नौ दिन तक मंडल घाटी के ग्रामीण मां का पूजन करते है। इस मंदिर की विशेषता यह है कि अन्य मंदिरों की तरह यहां पर बलि प्रथा का प्रावधान नहीं है। यहां श्रद्धालुओं को विशेष प्रसाद दिया जाता है। यह स्थानीय स्तर पर उगाए गए गेहूं के आटे का होता है।

ऐसे पहुंचे-


ऋषिकेश से चमोली तक 250 किलोमीटर सड़क मार्ग से पहुंच सकते हैं। यहां से दस किलोमीटर गोपेश्वर पहुंचने के बाद 13 किलोमीटर दूर मंडल तक भी वाहन की सुविधा है। मंडल से पांच किलोमीटर पैदल चढ़ाई चढ़कर मां के मंदिर तक पहुंचा जा सकता है।

Monday, 4 August 2014

सरस्वती मंदिर माणा उत्तराखंड -यहीं देवी सरस्वती पहली बार प्रकट हुई थी।


बसंत पंचमी को विद्या और वाणी की देवी सरस्वती का जन्मोत्सव दिवस कहा जाता है। धरती पर एक स्थान ऐसा है जहां पहुंचकर आपको यह एहसास होगा कि देवी सरस्वती यहां विराजमान हैं।

माना जाता है कि यहीं देवी सरस्वती पहली बार प्रकट हुई थी। इसलिए इसे सरस्वती का जन्मस्थान भी कहा जाता है। यह स्थान बद्रीनाथ से महज तीन किलोमीटर की दूरी पर माणा गांव के पास स्थित है। यहां पर्वत के बीच से सरस्वती नदी की कलकल धारा का उद्गम होता है।इस उद्गम स्थल पर देवी सरस्वती का एक छोटा सा मंदिर है। माना जाता है इस मंदिर में देवी सरस्वती की प्रतिमा के दर्शन से साक्षात् सरस्वती के दर्शनों का लाभ मिलता है। माना जाता है कि देवी सरस्वती के हाथों में वीणा है जिसके सात सुरों से संसार में संगीत और जीव जंतुओं को वाणी मिली है।

सरस्वती माता के मंदिर के ठीक बाहर सरस्वती की जलधारा पर जब सूर्य की रोशनी पड़ती है तो पत्थरों और पानी पर इन्द्रधनुष के सात रंग नजर आते हैं। लोग ऐसा मानते हैं कि यह सरस्वती की वीणा के सप्तसुर की रश्मियां हैं। दर्शनार्थी इसके दर्शन से स्वयं को धन्य और आनंदित महसूस करते हैं।

माघ शुक्ल पंचमी यानी बसंत पंचमी के दिन मां सरस्वती की पूजा होती है। वेद और पुराणों में बताया गया है कि ज्ञान और वाणी की देवी मां सरस्वती इसी दिन प्रकट हुई थी।इसलिए इस तिथि को सरस्वती जन्मोत्सव भी कहा जाता है। पुराणों में देवी सरस्वती के प्रकट होने की जो कथा है उसके अनुसार सृष्टि का निर्माण कार्य पूरा करने के बाद ब्रह्मा जी ने जब अपनी बनायी सृष्टि को देखा तो उन्हें लगा कि उनकी सृष्टि मृत शरीर की भांति शांत है।इसमें न तो कोई स्वर है और न वाणी।अपनी उदासीन सृष्टि को देखकर ब्रह्मा जी निराश और दुःखी हो गये। ब्रह्मा जी भगवान विष्णु के पास गये और अपनी उदासीन सृष्टि के विषय में बताया। ब्रह्मा जी की बातों को सुनकर भगवान विष्णु ने कहा कि आप देवी सरस्वती का आह्वान कीजिए।
 आपकी समस्या का समाधान देवी सरस्वती ही कर सकती हैं।भगवान विष्णु के कथनानुसार ब्रह्मा जी ने देवी सरस्वती देवी का आह्वान किया। देवी सरस्वती हाथों में वीणा लेकर प्रकट हुई। ब्रह्मा जी ने उन्हें अपनी वीणा से सृष्टि में स्वर भरने का अनुरोध किया।देवी सरस्वती ने जैसे ही वीणा के तारों को छुआ उससे 'सा' शब्द फूट पड़ा।

इसी से संगीत के प्रथम सुर का जन्म हुआ। सा स्वर के कंपन से ब्रह्मा जी की मूक सृष्टि में ध्वनि का संचार होने लगा। हवाओं को, सागर को, पशु-पक्षियों एवं अन्य जीवों को वाणी मिल गयी। नदियों से कलकल की ध्वनि फूटने लगी। इससे ब्रह्मा जी अति प्रसन्न हुए उन्होंने सरस्वती को वाणी की देवी के नाम से सम्बोधित करते हुए वागेश्वरी नाम दिया।माता सरस्वती का एक नाम यह भी है। हाथों में वीणा होने के कारण मां सरस्वती वीणापाणि भी कहलायी।

लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आखिर देवी-देवताओं की प्रतिमाओं को जल में ही क्यों विसर्जित कर दिया जाता है। पण्डित मुरली झा बताते हैं कि इसका उत्तर शास्त्रों में है। शास्त्रों के अनुसार जल ब्रह्म का स्वरुप माना गया है। क्योंकि सृष्टि के आरंभ में और अंत में संपूर्ण सृष्टि में सिर्फ जल ही जल होता है।

Saturday, 2 August 2014

कटारमल सूर्य मंदिर उत्तराखण्ड - इनके सम्मुख श्रद्धा, प्रेम व भक्तिपूर्वक मांगी गई हर इच्छा पूर्ण होती है.



कोणार्क का सूर्य मंदिर अपनी बेजोड़ वास्तुकला के लिए भारत ही नहीं, अपितु सम्पूर्ण विश्व में प्रसिद्ध है.
भारत के उड़ीसा राज्य में स्थित यह पहला सूर्य मंदिर है जिसे भगवान सूर्य की आस्था का प्रतीक माना जाता है. ऐसा ही एक दूसरा सूर्य मंदिर उत्तराखण्ड राज्य के कुमांऊ मण्डल के अल्मोड़ा जिले के कटारमल गांव में है.

आईये जाने इस मंदिर के बारें में . . .

यह मंदिर 800 वर्ष पुराना एवं अल्मोड़ा नगर से लगभग 17 किमी की दूरी पर पश्चिम की ओर स्थित उत्तराखण्ड शैली का है. अल्मोड़ा-कौसानी मोटर मार्ग पर कोसी से ऊपर की ओर कटारमल गांव में यह मंदिर स्थित है.यह मंदिर हमारे पूर्वजों की सूर्य के प्रति आस्था का प्रमाण है, यह मंदिर बारहवीं शताब्दी में बनाया गया था, जो अपनी बनावट एवं चित्रकारी के लिए विख्यात है. मंदिर की दीवारों पर सुंदर एवं आकर्षक प्रतिमायें उकेरी गई हैं. जो मंदिर की सुंदरता में चार चांद लगा देती हैं. यह मंदिर उत्तराखण्ड के गौरवशाली इतिहास का प्रमाण है.

महापंडित राहुल सांकृत्यायन ने इस मन्दिर की भूरि-भूरि प्रशंसा की. उनका मानना है कि यहाँ पर समस्त हिमालय के देवतागण एकत्र होकर पूजा-अर्चना करते रहे हैं. उन्होंने यहाँ की दीवारों पर उकेरी गई मूर्तियों एवं कला की प्रशंसा की है. इस मन्दिर में सूर्य पद्मासन लगाकर बैठे हुए हैं. सूर्य भगवान की यह मूर्ति एक मीटर से अधिक लम्बी और पौन मीटर चौड़ी भूरे रंग के पत्थर से बनाई गई है. यह मूर्ति बारहवीं शताब्दी की बतायी जाती है. कोणार्क के सूर्य मन्दिर के बाद कटारमल का यह सूर्य मन्दिर दर्शनीय है. कोणार्क के सूर्य मन्दिर के बाहर जो झलक है, वह कटारमल के सूर्य मन्दिर में आंशिक रूप में दिखाई देती है.
देवदार और सनोबर के पेड़ों से घिरे अल्मोड़ा की पहाड़ियों में स्थित कटारमल का सूर्यमंदिर 9 वीं सदी की वास्तुकला का बेजोड़ नमूना है. कस्तूरी साम्राज्य में इसे बनवाया गया था.पूर्वजों की आस्था का केन्द्र , कला का अद्भुत सौंदर्य

इतिहास

कटारमल देव (1080-90 ई०) ने अल्मोड़ा से लगभग 7 मील की दूरी पर बड़ादित्य (महान सूर्य) के मंदिर का निर्माण कराया था. उस गांव को, जिसके निकट यह मंदिर है, अब कटारमल तथा मंदिर को कटारमल मंदिर कहा जाता है.
यहां के मंदिर पुंज के मध्य में कत्यूरी शिखर वाले बड़े और भव्य मंदिर का निर्माण राजा कटारमल देव ने कराया था. इस मंदिर में मुख्य प्रतिमा सूर्य की है जो 12वीं शती में निर्मित है. इसके अलावा शिव-पार्वती, लक्ष्मी-नारायण, नृसिंह, कुबेर, महिषासुरमर्दिनी आदि की कई मूर्तियां गर्भगृह में रखी हुई हैं.
मंदिर में सूर्य की औदीच्य प्रतिमा है, जिसमें सूर्य को बूट पहने हुये खड़ा दिखाया गया है. मंदिर की दीवार पर तीन पंक्तियों वाला शिलालेख, जिसे लिपि के आधार पर राहुल सांकृत्यायन ने 10वीं-11वीं शती का माना है, जो अब अस्पष्ट हो गया है. इसमें राहुल जी ने ...मल देव... तो पढ़ा था, सम्भवतः लेख में मंदिर के निर्माण और तिथि के बारे में कुछ सूचनायें रही होंगी, जो अब स्पष्ट नहीं हैं. मन्दिर में प्रमुख मूर्ति बूटधारी आदित्य (सूर्य) की है, जिसकी आराधना शक जाति में विशेष रूप से की जाती है. इस मंदिर में सूर्य की दो मूर्तियों के अलावा विष्णु, शिव, गणेश की प्रतिमायें हैं. मंदिर के द्वार पर एक पुरुष की धातु मूर्ति भी है, राहुल सांकृत्यायन ने यहां की शिला और धातु की मूर्तियों को कत्यूरी काल का बताया है.

कटारमल सूर्य मंदिर

इस सूर्य मंदिर का लोकप्रिय नाम बारादित्य है. पूरब की ओर रुख वाला यह मंदिर कुमाऊं क्षेत्र का सबसे बड़ा और सबसे ऊंचा मंदिर है. माना जाता है कि इस मंदिर का निर्माण कत्यूरी वंश के मध्यकालीन राजा कटारमल ने किया था, जिन्होंने द्वाराहाट से इस हिमालयीय क्षेत्र पर शासन किया. यहां पर विभिन्न समूहों में बसे छोटे-छोटे मंदिरों के 50 समूह हैं. मुख्य मंदिर का निर्माण अलग-अलग समय में हुआ माना जाता है. वास्तुकला की विशेषताओं और खंभों पर लिखे शिलालेखों के आधार पर इस मंदिर का निर्माण 13वीं शदी में हुआ माना जाता है.
इस मंदिर में सूर्य पद्मासन मुद्रा में बैठे हैं, कहा जाता है कि इनके सम्मुख श्रद्धा, प्रेम व भक्तिपूर्वक मांगी गई हर इच्छा पूर्ण होती है. इसलिये श्रद्धालुओं का आवागमन वर्ष भर इस मंदिर में लगा रहता है, भक्तों का मानना है कि इस मंदिर के दर्शन मात्र से ही हृदय में छाया अंधकार स्वतः ही दूर होने लगता है और उनके दुःख, रोग, शोक आदि सब मिट जाते हैं और मनुष्य प्रफुल्लित मन से अपने घर लौटता है. कटारमल गांव के बाहर छत्र शिखर वाला मंदिर बूटधारी सूर्य के भव्य व आकर्षक प्रतिमा के कारण प्रसिद्ध है. यह भव्य मंदिर भारत के प्रसिद्ध कोणार्क के सूर्य मंदिर के पश्चात दूसरा प्रमुख मंदिर भी है. स्थानीय जनश्रुति के अनुसार कत्यूरी राजा कटारमल्ल देव ने इसका निर्माण एक ही रात में करवाया था. यहां सूर्य की बूटधारी तीन प्रतिमाओं के अतिरिक्त विष्णु, शिव और गणेश आदि देवी-देवताओं की अनेक मूर्तियां भी हैं.
ऎसा कहा जाता है कि देवी-देवता यहां भगवान सूर्य की आराधना करते थे, सुप्रसिद्ध साहित्यकार राहुल सांकृत्यायन भी मानते थे कि समस्त हिमालय के देवतागण यहां एकत्र होकर सूर्य की पूजा-अर्चना करते थे. प्राचीन समय से ही सूर्य के प्रति आस्थावान लोग इस मंदिर में आयोजित होने वाले धार्मिक कार्यों में हमेशा बढ़-चढ़ कर अपनी भागीदारी दर्ज करवाते हैं, क्योंकि सूर्य सभी अंधकारों को दूर करते हैं, इसकी महत्ता के कारण इस क्षेत्र में इस मंदिर को बड़ा आदित्य मंदिर भी कहा जाता है. कलाविद हर्मेन गोयट्ज के अनुसार मंदिर की शैली प्रतिहार वास्तु के अन्तर्गत है।

इस मंदिर की स्थापना के विषय में विद्वान एकमत नहीं हैं, कई इतिहासकारों का मानना है कि समय-समय पर इसका जीर्णोद्धार होता रहा है, लेकिन वास्तुकला की दृष्टि से यह सूर्य मंदिर 21 वीं शती का प्रतीत होता है. वैसे इस मंदिर का निर्माण कत्यूरी साम्राज्य के उत्कर्ष युग में 8वीं - 9वीं शताब्दी में हुआ था, तब इस मंदिर की काफी प्रतिष्ठा थी और बलि-चरु-भोग के लिये मंदिर मेम कई गांवों के निवासी लगे रहते थे.इस ऎतिहासिक प्राचीन मंदिर को सरकार ने प्राचीन स्मारक तथा पुरातत्व स्थल घोषित कर राष्ट्रीय सम्पत्ति घोषित कर दिया है. मंदिर में स्थापित अष्टधातु की प्राचीन प्रतिमा को मूर्ति तस्करों ने चुरा लिया था, जो इस समय राष्ट्रीय पुरातत्व संग्रहालय, नई दिल्ली में रखी गई है, साथ ही मंदिर के लकड़ी के सुन्दर दरवाजे भी वहीं पर रखे गये हैं, जो अपनी विशिष्ट काष्ठ कला के लिए विश्व प्रसिद्ध हैं.

कैसे पहुंचे


कटारमल सूर्य मन्दिर तक पहुँचने के लिए अल्मोड़ा से रानीखेत मोटरमार्ग के रास्ते से जाना होता है. अल्मोड़ा से 14 किमी जाने के बाद 3 किमी पैदल चलना पड़ता है. यह मन्दिर 1554 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है. अल्मोड़ा से कटारमल मंदिर की कुल दूरी 17 किमी के लगभग है.

Tuesday, 29 July 2014

वीरांगना तीलू रौतेली-अपूर्व शौर्य ,संकल्प और साहस की धनी



वीर भोग्य वसुंधरा के भारतीय इतिहास के प्राचीन और अर्वाचीन पन्नो को पलटें तो स्वर्णाक्षरों में अंकित वीर- वीरांगनाओं की अनगिनत कहानियां खुद ब खुद अपनी चमक बिखेर उठती है |भारत भूमि का कोई भी भू भाग ऐसा नहीं है जिसने वीर-वीरांगनाओ की फसल न उगाई हो |लेकिन बात यदि देवभूमि उत्तराखंड के सन्दर्भ में की जाय तो बात इसलिए भी मायने रखती है कि इस कठिन परिवेश में पहाड़ो का हौंसला रखने वाले न जाने कितने वीरों ने अपनी मातृभूमि के लिए जीवन उत्सर्ग कर दिया लेकिन इतिहास में उन्हें समुचित स्थान प्राप्त नहीं हो पाया और शायद स्थान प्राप्ति का उनका कोई उद्देश्य था भी नहीं| उन्ही वीर वीरांगनाओ में उत्तराखंड के चौन्दकोट गढ़ी के गुराड गाँव में गोर्ला रावतो के वंश में सत्रहवीं सदी में उत्पन्न तीलू रौतेली का नाम प्रमुखता से लिया जाता है |अपूर्व शौर्य ,संकल्प और साहस की धनी इस वीरांगना को गढ़वाल के इतिहास में झांसी की रानी कहकर याद किया जाता है | १५ से २२ वर्ष की आयु के मध्य सात वर्षो तक लगातार युद्ध लड़ने वाली तीलू संभवत: विश्व की एकमात्र वीरांगना है | तीलू रौतेली थोकदार भूप सिंह गोर्ला की पुत्री थी |१५ वर्ष की आयु में ही तीलू की मंगनी ईडा गाँव के भुप्पा नेगी के पुत्र के साथ हो गयी थी किन्तु नियति के क्रूर हाथों तीलू के पिता ,मंगेतर और दो भाईयों भगतु और पत्वा के प्राण कत्युरी राजा धामशाही और खैरागढ़ के मानशाही के मध्य हुए युद्ध के पश्चात कत्यूरियों के विरुद्ध युद्धोत्तर विद्रोह में समय पूर्व ही युद्ध भूमि में न्यौछावर हो गए थे | तीलू के लिए यह समय अत्यंत दुखदायी और कठिन परीक्षा का था | युवावस्था की दहलीज पर खड़ी तीलू कांडा में प्रतिवर्ष होने वाले मेले में, जहाँ पर उसके पिता और भाइयों का वध हुआ था, अपनी सहेलियों के साथ जाना चाहती थी लेकिन उसकी माँ ने क्रोधित होकर उससे उसके पिता और भाइयों के तर्पण हेतु धामशाही का खून लाने को कहा | उम्र के उस दौर में जब ह्रदय की सुकोमल संकल्पनाएँ अपनी ऊँचाइयों पर उड़ान भर रही होती है, तब तीलू हाथों में तलवार लिए शत्रुओं का मान मर्दन करने के लिए उठ खड़ी हुई | ठीक उसी तरह जिस तरह झाँसी की रानी अपनी सहेली झलकारी बाई के साथ अंग्रेजो से लोहा लिया था,शस्त्रों से लैस सैनिको तथा बिंदुली नाम की काले रंग की घोड़ी और सहेलियों बेल्लू और देवली को साथ लेकर उसने युद्ध की तैयारी शुरू कर दी |सबसे पहले उसने खैरागढ़ को कत्यूरियों से मुक्त कराया |उसके बाद उमटागढ़ी पर धावा बोला,फिर वह अपने सैन्य दल के साथ सल्ट महादेव पहुंची |वहां से भी शत्रुओ का विनाश कर भिलंण भौण की ओर प्रस्थान किया लेकिन दुर्भाग्य से तीलू की दोनों प्रिय सहेलियों को इस युद्ध में मृत्यु का आलिंगन करना पड़ा |चौखुटिया तक गढ़ राज्य की सीमा निर्धारित करने के बाद तीलू अपने सैन्य दल के साथ देघाट वापस लौट आई |कलिंका खाल में उसका शत्रुओ के साथ भीषण संग्राम हुआ |सराईखेत के युद्ध में उसने कई कत्यूरियों को मौत के घाट उतारकर अपने पिता की मृत्यु का बदला लिया,यहीं पर उसकी बिंदुली घोड़ी शत्रु दल का शिकार भी बनी | इसके उपरान्त तल्ला कांडा शिविर के समीप पूर्वी नयार नदी के तट पर स्नान कर रही थी तो एक शत्रु सैनिक रामू रजवार ने धोखे से तीलू पर तलवार से वार कर दिया | नयार नदी तीलू के रक्त में रंग उठी थी और इसके साथ ही उस वीर बाला का अंत हो चुका था | |…बीरोंखाल में उसकी आदमकद मूर्ति आज भी उस वीर बाला की याद दिलाती है | तीलू कि याद में रण भूत नचाया जाता है . जबतीलू रौतेली नचाई जाती है तो अन्य बीरों के रण भूत /पश्वा जैसे शिब्बूपोखरियाल, घिमंडू हुडक्या, बेलु -पत्तू सखियाँ , नेगी सरदार आदि के पश्वाओंको भी नचाया जाता है . सबके सब पश्वा मंडांण में युद्ध नृत्य के साथ नाचते हैं |
जब तीलू रौतेली नचाई जाती है तो अन्य बीरों के रण भूत /पश्वा जैसे शिब्बू पोखरियाल, घिमंडू हुडक्या, बेलु -पत्तू सखियाँ , नेगी सरदार आदि के पश्वाओं को भी नचाया जाता है . सबके सब पश्वा मंडांण में युद्ध नृत्य के साथ नाचते हैं”

ओ तू साक्षी रैली पंच पाल देव
कालिका की देवी लंगडिया भैरों
ताडासर देव , अमर तीलु, सिंगनी शार्दूला धका धै धै |
जब तक भूमि , सूरज आसमान
तीलु रौतेली की तब तक याद रैली
धका धे धे तीलु रौतेली धका धै धै तीलु रौतेली धका धै धै |

एक किंवदंति के अनुसार १९६२ में भारत-चीन युद्ध के समय ७२ घंटे तक लगातार कई मोर्चो से एक साथ अकेले ही चीनियों से लोहा लेने वाले और मरणोपरांत महावीर चक्र प्राप्त पौड़ी गढ़वाल के गोर्ला राजपूत रायफल मैन जसवंत सिंह की अरुणाचल प्रदेश के नूर नांग पर्वत श्रेणियों में देवदूत स्वरूपा शीला नाम की जिस कन्या ने साये की तरह उसकी सहायता कर गोला बारूद और भोजन आदि की व्यवस्था कर उसे अकेले होने का अहसास तक नहीं होने दिया, वो और कोई नहीं उनकी पूर्वज वीर बाला तीलू रौतेली की आत्मा ही थी |.. किंवदंति कितनी सही है या गलत, लेकिन इतनी कम उम्र में उसके द्वारा प्रदर्शित अप्रतिम शौर्य , साहस और बलिदान को इतिहास में सदा ही याद रखा जायेगा |