Wednesday, 24 September 2014

नवरात्रि व्रत का महत्व- May the festival of Navratri bring joy and prosperity in your life-Happy Navratri




ईश्वर की उपासना के लिए किसी मुहूर्त विशेष की प्रतीक्षा नहीं की जाती. सारा समय भगवान का है, सभी दिन पवित्र हैं, हर घड़ी शुभ मुहूर्त है. हां, प्रकृति में कुछ विशिष्ट अवसर ऐसे आते हैं कि कालचक्र की उस प्रतिक्रिया से मनुष्य सहज ही लाभ उठा सकता है.

कालचक्र के सूक्ष्म ज्ञाता ऋषियों ने प्रकृति के अंतराल में चल रहे विशिष्ट उभारों को दृष्टिगत रख कर ही ऋतुओं के इस मिलन काल की संधिवेला को नवरात्र की संज्ञा दी है. नवरात्र पर्वों का साधना विज्ञान में विशेष महत्व है. प्रात:कालीन और सायंकालीन संध्या को पूजा-उपासना के लिए महत्वपूर्ण माना गया है.
शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष के परिवर्तन के दो दिन पूर्णिमा एवं अमावस्या के नाम से जाने जाते हैं तथा कई महत्वपूर्ण पर्व इसी संधिवेला में मनाये जाते हैं. इसी प्रकार ऋतुओं का भी संधिकाल होता है. शीत और ग्रीष्म ऋतुओं के मिलन का यह संधिकाल वर्ष में दो बार आता है. चैत्र में मौसम ठंडक से बदल कर गर्मी का रूप ले लेता है और आश्विन में गर्मी से ठंडक का.

आयुर्वेदाचार्य शरीर शोधन-विरेचन एवं कायाकल्प जैसे विभिन्न प्रयोगों के लिए संधिकाल की इसी अवधि की प्रतीक्षा करते हैं. शरीर और मन के विकारों का निष्कासन-परिशोधन भी इस अवसर पर आसानी से हो सकता है.  उसी प्रकार नवरात्रियां भी प्रकृति जगत में ऋतुओं का ऋतुकाल हैं, जो नौ-नौ दिन के होती हैं. उस समय उष्णता और शीत दोनों ही साम्यावस्था में होते हैं.

नवरात्रि का अर्थ होता है, नौ रातें। हिन्दू धर्मानुसार यह पर्व वर्ष में दो बार आता है। एक शरद माह की नवरात्रि और दूसरी बसंत माह की| इस पर्व के दौरान तीन प्रमुख हिंदू देवियों- पार्वती, लक्ष्मी और सरस्वती के नौ स्वरुपों श्री शैलपुत्री, श्री ब्रह्मचारिणी, श्री चंद्रघंटा, श्री कुष्मांडा, श्री स्कंदमाता, श्री कात्यायनी, श्री कालरात्रि, श्री महागौरी, श्री सिद्धिदात्री का पूजन विधि विधान से किया जाता है | जिन्हे नवदुर्गा कहते हैं।

प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्माचारिणी। तृतीय चंद्रघण्टेति कुष्माण्डेति चतुर्थकम्।
पंचमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च।सप्तमं कालरात्रि महागौरीति चाऽष्टम्।
नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गा प्रकीर्तिताः।

नव दुर्गा-

प्रथम दुर्गा : श्री शैलपुत्री

श्री दुर्गा का प्रथम रूप श्री शैलपुत्री हैं। पर्वतराज हिमालय की पुत्री होने के कारण ये शैलपुत्री कहलाती हैं। नवरात्र के प्रथम दिन इनकी पूजा और आराधना की जाती है।

द्वितीय दुर्गा : श्री ब्रह्मचारिणी

श्री दुर्गा का द्वितीय रूप श्री ब्रह्मचारिणी हैं। यहां ब्रह्मचारिणी का तात्पर्य तपश्चारिणी है। इन्होंने भगवान शंकर को पति रूप से प्राप्त करने के लिए घोर तपस्या की थी। अतः ये तपश्चारिणी और ब्रह्मचारिणी के नाम से विख्यात हैं। नवरात्रि के द्वितीय दिन इनकी पूजा और अर्चना की जाती है।

तृतीय दुर्गा : श्री चंद्रघंटा

श्री दुर्गा का तृतीय रूप श्री चंद्रघंटा है। इनके मस्तक पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र है, इसी कारण इन्हें चंद्रघंटा देवी कहा जाता है। नवरात्रि के तृतीय दिन इनका पूजन और अर्चना किया जाता है। इनके पूजन से साधक को मणिपुर चक्र के जाग्रत होने वाली सिद्धियां स्वतः प्राप्त हो जाती हैं तथा सांसारिक कष्टों से मुक्ति मिलती है।

चतुर्थ दुर्गा : श्री कूष्मांडा

श्री दुर्गा का चतुर्थ रूप श्री कूष्मांडा हैं। अपने उदर से अंड अर्थात् ब्रह्मांड को उत्पन्न करने के कारण इन्हें कूष्मांडा देवी के नाम से पुकारा जाता है। नवरात्रि के चतुर्थ दिन इनकी पूजा और आराधना की जाती है। श्री कूष्मांडा की उपासना से भक्तों के समस्त रोग-शोक नष्ट हो जाते हैं।

पंचम दुर्गा : श्री स्कंदमाता

श्री दुर्गा का पंचम रूप श्री स्कंदमाता हैं। श्री स्कंद (कुमार कार्तिकेय) की माता होने के कारण इन्हें स्कंदमाता कहा जाता है। नवरात्रि के पंचम दिन इनकी पूजा और आराधना की जाती है। इनकी आराधना से विशुद्ध चक्र के जाग्रत होने वाली सिद्धियां स्वतः प्राप्त हो जाती हैं।

षष्ठम दुर्गा : श्री कात्यायनी
श्री दुर्गा का षष्ठम् रूप श्री कात्यायनी। महर्षि कात्यायन की तपस्या से प्रसन्न होकर आदिशक्ति ने उनके यहां पुत्री के रूप में जन्म लिया था। इसलिए वे कात्यायनी कहलाती हैं। नवरात्रि के षष्ठम दिन इनकी पूजा और आराधना होती है।

सप्तम दुर्गा : श्री कालरात्रि

श्रीदुर्गा का सप्तम रूप श्री कालरात्रि हैं। ये काल का नाश करने वाली हैं, इसलिए कालरात्रि कहलाती हैं। नवरात्रि के सप्तम दिन इनकी पूजा और अर्चना की जाती है। इस दिन साधक को अपना चित्त भानु चक्र (मध्य ललाट) में स्थिर कर साधना करनी चाहिए।

अष्टम दुर्गा : श्री महागौरी

श्री दुर्गा का अष्टम रूप श्री महागौरी हैं। इनका वर्ण पूर्णतः गौर है, इसलिए ये महागौरी कहलाती हैं। नवरात्रि के अष्टम दिन इनका पूजन किया जाता है। इनकी उपासना से असंभव कार्य भी संभव हो जाते हैं।

नवम् दुर्गा : श्री सिद्धिदात्री

श्री दुर्गा का नवम् रूप श्री सिद्धिदात्री हैं। ये सब प्रकार की सिद्धियों की दाता हैं, इसीलिए ये सिद्धिदात्री कहलाती हैं। नवरात्रि के नवम दिन इनकी पूजा और आराधना की जाती है।
इस दिन को रामनवमी भी कहा जाता है और शारदीय नवरात्रि के अगले दिन अर्थात दसवें दिन को रावण पर राम की विजय के रूप में मनाया जाता है। दशम् तिथि को बुराई पर अच्छाकई की विजय का प्रतीक माना जाने वाला त्योतहार विजया दशमी यानि दशहरा मनाया जाता है। इस दिन रावण, कुम्भकरण और मेघनाथ के पुतले जलाये जाते हैं।

नवरात्रि का महत्व एवं मनाने का कारण -

नवरात्रि काल में रात्रि का विशेष महत्‍व होता है|देवियों के शक्ति स्वरुप की उपासना का पर्व नवरात्र प्रतिपदा से नवमी तक, निश्चित नौ तिथि, नौ नक्षत्र, नौ शक्तियों की नवधा भक्ति के साथ सनातन काल से मनाया जा रहा है। सर्वप्रथम श्रीरामचंद्रजी ने इस शारदीय नवरात्रि पूजा का प्रारंभ समुद्र तट पर किया था और उसके बाद दसवें दिन लंका विजय के लिए प्रस्थान किया और विजय प्राप्त की । तब से असत्य, अधर्म पर सत्य, धर्म की जीत का पर्व दशहरा मनाया जाने लगा। नवरात्रि के नौ दिनों में आदिशक्ति माता दुर्गा के उन नौ रूपों का भी पूजन किया जाता है जिन्होंने सृष्टि के आरम्भ से लेकर अभी तक इस पृथ्वी लोक पर विभिन्न लीलाएँ की थीं। माता के इन नौ रूपों को नवदुर्गा के नाम से जाना जाता है।

नवरात्रि के समय रात्रि जागरण अवश्‍य करना चाहिये और यथा संभव रात्रिकाल में ही पूजा हवन आदि करना चाहिए। नवदुर्गा में कुमारिका यानि कुमारी पूजन का विशेष अर्थ एवं महत्‍व होता है। गॉंवों में इन्‍हें कन्‍या पूजन कहते हैं। जिसमें कन्‍या पूजन कर उन्‍हें भोज प्रसाद दान उपहार आदि से कुमारी कन्याओं की सेवा की जाती है।

नवरात्रि व्रत विधि-

आश्विन मास के शुक्लपक्ष कि प्रतिपद्रा से लेकर नौं दिन तक विधि पूर्वक व्रत करें। प्रातः काल उठकर स्नान करके, मन्दिर में जाकर या घर पर ही नवरात्रों में दुर्गाजी का ध्यान करके कथा पढ़नी चहिए। यदि दिन भर का व्रत न कर सकें तो एक समय का भोजन करें । इस व्रत में उपवास या फलाहार आदि का कोई विशेष नियम नहीं है। कन्याओं के लिये यह व्रत विशेष फलदायक है। कथा के अन्त में बारम्बार ‘दुर्गा माता तेरी सदा जय हो’ का उच्चारण करें ।

गुप्त नवरात्री :-

हिंदू धर्म के अनुसार एक वर्ष में चार नवरात्रि होती है। वर्ष के प्रथम मास अर्थात चैत्र में प्रथम नवरात्रि होती है। चौथे माह आषाढ़ में दूसरी नवरात्रि होती है। इसके बाद अश्विन मास में प्रमुख नवरात्रि होती है। इसी प्रकार वर्ष के ग्यारहवें महीने अर्थात माघ में भी गुप्त नवरात्रि मनाने का उल्लेख एवं विधान देवी भागवत तथा अन्य धार्मिक ग्रंथों में मिलता है।

इनमें अश्विन मास की नवरात्रि सबसे प्रमुख मानी जाती है। इस दौरान पूरे देश में गरबों के माध्यम से माता की आराधना की जाती है। दूसरी प्रमुख नवरात्रि चैत्र मास की होती है। इन दोनों नवरात्रियों को क्रमश: शारदीय व वासंती नवरात्रि के नाम से भी जाना जाता है। इसके अतिरिक्त आषाढ़ तथा माघ मास की नवरात्रि गुप्त रहती है। इसके बारे में अधिक लोगों को जानकारी नहीं होती, इसलिए इन्हें गुप्त नवरात्रि कहते हैं। गुप्त नवरात्रि विशेष तौर पर गुप्त सिद्धियां पाने का समय है। साधक इन दोनों गुप्त नवरात्रि में विशेष साधना करते हैं तथा चमत्कारिक शक्तियां प्राप्त करते हैं।

कलश स्थापना-

नवरात्र के दिनों में कहीं-कहीं पर कलश की स्थापना की जाती है एक चौकी पर मिट्टी का कलश पानी भरकर मंत्रोच्चार सहित रखा जाता है। मिट्टी के दो बड़े कटोरों में मिट्टी भरकर उसमे गेहूं/जौ के दाने बो कर ज्वारे उगाए जाते हैं और उसको प्रतिदिन जल से सींचा जाता है। दशमी के दिन देवी-प्रतिमा व ज्वारों का विसर्जन कर दिया जाता है।

महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती मुर्तियाँ बनाकर उनकी नित्य विधि सहित पूजा करें और पुष्पो को अर्ध्य देवें । इन नौ दिनो में जो कुछ दान आदि दिया जाता है उसका करोड़ों गुना मिलता है इस नवरात्र के व्रत करने से ही अश्वमेघ यज्ञ का फल मिलता है।

कन्या पूजन-

नवरात्रि के आठवें दिन महागौरी की उपासना का विधान है। अष्टमी के दिन कन्या-पूजन का महत्व है जिसमें 5, 7,9 या 11 कन्याओं को पूज कर भोजन कराया जाता है।

नवरात्रि व्रत की कथा-

नवरात्रि व्रत की कथा के बारे प्रचलित है कि पीठत नाम के मनोहर नगर में एक अनाथ नाम का ब्राह्यण रहता था। वह भगवती दुर्गा का भक्त था। उसके सुमति नाम की एक अत्यन्त सुन्दर कन्या थी। अनाथ, प्रतिदिन दुर्गा की पूजा और होम किया करता था, उस समय सुमति भी नियम से वहाँ उपस्थित होती थी। एक दिन सुमति अपनी साखियों के साथ खेलने लग गई और भगवती के पूजन में उपस्थित नहीं हुई। उसके पिता को पुत्री की ऐसी असावधानी देखकर क्रोध आया और पुत्री से कहने लगा कि हे दुष्ट पुत्री! आज प्रभात से तुमने भगवती का पूजन नहीं किया, इस कारण मै किसी कुष्ठी और दरिद्र मनुष्य के साथ तेरा विवाह करूँगा। पिता के इस प्रकार के वचन सुनकर सुमति को बड़ा दुःख हुआ और पिता से कहने लगी कि ‘मैं आपकी कन्या हूँ। मै सब तरह से आधीन हूँ जैसी आप की इच्छा हो मैं वैसा ही करूंगी। रोगी, कुष्ठी अथवा और किसी के साथ जैसी तुम्हारी इच्छा हो मेरा विवाह कर सकते हो। होगा वही जो मेरे भाग्य में लिखा है। मनुष्य न जाने कितने मनोरथों का चिन्तन करता है, पर होता है वही है जो भाग्य विधाता ने लिखा है। अपनी कन्या के ऐसे कहे हुए वचन सुनकर उस ब्राम्हण को अधिक क्रोध आया। तब उसने अपनी कन्या का एक कुष्ठी के साथ विवाह कर दिया और अत्यन्त क्रुद्ध होकर पुत्री से कहने लगा कि जाओ-जाओ जल्दी जाओ अपने कर्म का फल भोगो। सुमति अपने पति के साथ वन चली गई और भयानक वन में कुशायुक्त उस स्थान पर उन्होंने वह रात बड़े कष्ट से व्यतीत की।उस गरीब बालिका कि ऐसी दशा देखकर भगवती पूर्व पुण्य के प्रभाव से प्रकट होकर सुमति से कहने लगी की, हे दीन ब्रम्हणी! मैं तुम पर प्रसन्न हूँ, तुम जो चाहो वरदान माँग सकती हो। मैं प्रसन्न होने पर मनवांछित फल देने वाली हूँ। इस प्रकार भगवती दुर्गा का वचन सुनकर ब्रह्याणी कहने लगी कि आप कौन हैं जो मुझ पर प्रसन्न हुईं। ऐसा ब्रम्हणी का वचन सुनकर देवी कहने लगी कि मैं तुझ पर तेरे पूर्व जन्म के पुण्य के प्रभाव से प्रसन्न हूँ। तू पूर्व जन्म में निषाद (भील) की स्त्री थी और पतिव्रता थी। एक दिन तेरे पति निषाद द्वारा चोरी करने के कारण तुम दोनों को सिपाहियों ने पकड़ कर जेलखाने में कैद कर दिया था। उन लोगों ने तेरे और तेरे पति को भोजन भी नहीं दिया था। इस प्रकार नवरात्र के दिनों में तुमने न तो कुछ खाया और न ही जल पिया इसलिए नौ दिन तक नवरात्र का व्रत हो गया।हे ब्रम्हाणी ! उन दिनों में जो व्रत हुआ उस व्रत के प्रभाव से प्रसन्न होकर तुम्हे मनोवांछित वस्तु दे रही हूँ। ब्राह्यणी बोली की अगर आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो कृपा करके मेरे पति के कोढ़ को दूर करो। उसके पति का शरीर भगवती की कृपा से कुष्ठहीन होकर अति कान्तियुक्त हो गया।

Wednesday, 17 September 2014

कैसे अजय बिष्ट बने महंत आदित्यनाथ-अर्जुन की तरह ही आज भी रक्षा करने का ये जज्बा गोरखपुर की धरा पर कायम है-महंत आदित्यनाथ


पौड़ी जिले के पंचेर गांव में नंद सिंह बिष्ट के घर पांच जून 1972 को जन्मे बालक का नाम अजय रखा गया।

14 सितंबर को उनके जीवन में नया अध्याय जुड़ गया। महंत अवेद्यनाथ के समाधिस्थ होने के साथ ही बेशुमार लोगों और संत समाज के गणमान्य लोगों के बीच उन्होंने गोरक्षपीठाधीश्वर का दायित्व संभाल लिया। वैसे उनके राजनीतिक जीवन की शुरुआत छात्र जीवन से ही हो गई थी। गढ़वाल विश्वविद्यालय से बीएससी की डिग्री हासिल करने तक उनकी गिनती अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के प्रखर कार्यकर्ताओं के रूप में होने लगी थी। नाम के अनुरूप बाल्यावस्था से हर काम की तेजी से अजय ने न सिर्फ अपने अजेयभाव का प्रदर्शन किया बल्कि कम उम्र में संत पंथ को अपनाकर न सिर्फ आदित्यनाथ बन गए बल्कि वोटों की शक्ल में आम लोगों का दिल जीतकर 1998 में सबसे कम उम्र सांसद बनने का गौरव भी हासिल किया।

इसके बाद 22 साल की उम्र में परिवार त्यागकर वह योगी स्वरूप में आ गए। 1993 से अपना केंद्र गोरखपुर बना लिया और गोरखनाथ मंदिर में निरंतर बढ़ते सेवाभाव ने उन्हें 15 फरवरी 1994 को उनको गोरक्षपीठाधीश्वर के उत्तराधिकारी की पदवी तक पहुंचा दिया।इसके बाद 1998 में जब फिर लोकसभा का चुनाव की घोषणा हुई तो गोरक्षपीठाधीश्वर ने अपनी सियासी विरासत भी उन्हें सौंपते हुए चुनाव लड़ाने का फैसला लिया।इस चुनाव में जीतकर उन्हें सबसे कम उम्र का सांसद बनने का गौरव हासिल हुआ। उसके बाद से वह लगातार पांचवीं बार चुनाव जीतकर बाल्यवस्था के अपने नाम के अनुरूप खुद के अजेय भाव को प्रदर्शित कर रहे हैं।
एक कार्यक्रम के दौरान उनके भाषण ने ब्रह्मलीन महंत अवेद्यनाथ को प्रभावित किया और उनके आह्वान पर रामजन्मभूमि आंदोलन से जुड़ गए। गतिविधियों के साथ काम के प्रति समर्पण का भाव बढ़ता देख महंत अवेद्यनाथ उन्हें अपना शिष्य बनाने पर हामी भर दी।

1996 के लोकसभा चुनाव में जब महंत अवेद्यनाथ गोरखपुर संसदीय सीट से भाजपा के टिकट पर चुनाव मैदान में थे तो चुनाव का कुशल संचालन करके उन्होंने अपनी राजनीतिक सूझ का खास परिचय दिया।

जब सम्पूर्ण पूर्वी उत्तर प्रदेश जेहाद, धर्मान्तरण, नक्सली व माओवादी हिंसा, भ्रष्टाचार तथा अपराध की अराजकता में जकड़ा था उसी समय नाथपंथ के विश्व प्रसिद्ध मठ श्री गोरक्षनाथ मंदिर गोरखपुर के पावन परिसर में शिव गोरक्ष महायोगी गोरखनाथ जी के अनुग्रह स्वरूप माघ शुक्ल 5 संवत् 2050 तदनुसार 15 फरवरी सन् 1994 की शुभ तिथि पर गोरक्षपीठाधीश्वर महंत अवेद्यनाथ जी महाराज ने अपने उत्तराधिकारी योगी आदित्यनाथ जी का दीक्षाभिषेक सम्पन्न किया।

अपने धार्मिक उत्तरदायित्व का निर्वहन करने के साथ-साथ योगी जी निरंतर समाज से जुड़ी समस्याओं के निवारण के लिए प्रयास करते रहते हैं। व्यक्तिगत समस्याओं से लेकर विकास योजनाओं तक की समस्याओं का हल वे बहुत ही धैर्यपूर्वक निकालते हैं।



1998 : 12वीं लोक सभा के लिए पहली बार गोरखपुर संसदीय क्षेत्र से निर्वाचित।
1999 : 13वीं लोक सभा के लिए दूसरी बार गोरखपुर संसदीय क्षेत्र से निर्वाचित।
2004 : 14वीं लोक सभा हेतु पुनः तीसरी बार निर्वाचित।
2009 : 15वीं लोक सभा हेतु पुनः चौथी बार निर्वाचित।
2014 : 16वीं लोक सभा हेतु पुनः पाँचवी बार निर्वाचित।

अपने अज्ञातवास के अंतिम समय में अर्जुन ने विराटनगर,नेपाल के राजा की गायो के हरण कर चुके कौरवो से जिस जगह युद्ध कर रक्षा की वो जगह ही  गो रक्षा पुर या गोरखपुर कहलाई. 

 अर्जुन की तरह ही आज भी रक्षा करने का ये जज्बा गोरखपुर की धरा पर कायम है आज की यह परंपरा गोरक्ष पीठ के महंत योगी आदित्यनाथ निभा रहे है. जिस ‘समाज की रक्षा’ संविन्धान,सेना, प्रशासन रक्षा नहीं कर पा रहा है उसकी रक्षा योगी आदित्यनाथ बिना पुकारे ही कर रहे है. वे कौन सी बात से ‘रक्षा’ कर रहे है या  किस तरह से ‘रक्षा’ कर रहे है वो भी किसी से भी छुपा नहीं है.

हिन्दू जनमानस में अपनी ख़ास पहचान रखने वाले गोरखपुर का ‘गोरक्ष पीठ’ नाम का मठ नाथ सम्प्रदाय के हठ-योगियों का गढ रहा, जाति-पाति से दूर इस सम्प्रदाय के शाखा तिब्बत, अफगानिस्तान, पाकिस्तान से लेकर पूरे पश्चिम उत्तर भारत में फैली थी. नाथ संप्रदाय को गुरु मच्छेंद्र नाथ और उनके शिष्य गोरखनाथ को हिन्दू समेत तिब्बती बौद्ध धर्म में महासिद्ध योगी माना जाता है. रावलपिंडी शहर को बसाने वाले राजपूत राजा बप्पा रावल के गोरखनाथ को अपना गुरु मानते थे व् इन्ही के प्रेरणा से मोरी (मौर्या) सेना को एकत्र कर मुहम्माब बिन कासिम के नेतृत्व में अरब हमलो से भारत की रक्षा की, आज उसी प्रकार से ‘समाज की रक्षा’ गोरखनाथ मठ के उत्तराधिकारी होने के नाते योगी आदित्यनाथ कर रहे है.

योगी जी की कर्मभूमी उत्तर प्रदेश का सबसे पूर्वी हिस्सा है, जिसमे गोरखपुर मंडल के देवरिया, गोरखपुर, कुशीनगर,महाराजगंज, बस्ती मंडल के बस्ती,संतकबीर नगर, सिद्धार्थनगर और आज़मगढ़ मंडल के आज़मगढ़, बलिया,मऊ जिले शामिल हैं. ये तीनो मंडल एक ख़ास विचारधारा से प्रभावित हो साम्प्रदायिकता का जवाब साम्प्रदायिकता की राजनीति की तरफ आकृष्ट हुए है. कई दशको से मठ आधारित ये राजनीति अपने शुरुवाती दिनों के सोफ्ट हिंदुत्व से उग्र हिन्दुत्ववादी हो चुकी है तो इसका श्रेय योगी आदित्य नाथ के आक्रामक स्वाभाव को ही जाता है. पूर्व में इसी विचारधारा के तहत महंत अवैद्य नाथ ने 1989 और 1991 में गोरखपुर से लोकसभा का चुनाव जीता व् उनके बाद से उनके उत्तराधिकारी बने योगी आदित्यनाथ ने लगातार 1996,1998, 1999 ,2004 और 2009 के चुनाव के चुनाव जीत अपनी इसी राजनीति के सफल होने का प्रमाण दिया.

जनप्रतिनिधि के रूप में उन्होंने जापानी इंसेफलाइटिस से बचाव और उसके उपचार के लिए उलेखनीय प्रयास किये, उसके अलावा गोरखपुर में सफाई व्यवस्था व् राप्ती नदी पर बांध बनवाने जैसे कई विकास के कार्य कराए है. सदियों से श्रद्धा का केंद्र रहने वाले गोरखनाथ पीठ के महंत होने की वजह से वे कभी भी मतदाता के सामने हाथ नहीं जोड़ते, उल्टे मतदाता उनके पैर छूकर आर्शीवाद मांगते हैं. सांसद होने के नाते कोई समस्या बयान करता तो वे सरकारी प्रक्रिया का इंतज़ार किये बिना  तुरंत संबंधित अधिकारी से बात कर समस्या का अपने स्तर पर निपटारा कर देते है. कुछ वर्ष पहले एक माफिया डॉन के द्वारा उनके एक मतदाता के मकान पर कब्जे से क्षुब्द, योगी ने सीधे ही उस मकान पर पहुँच अपने समर्थको के द्वारा उसे कब्जे से मुक्त करवा दिया ऐसे कई और मामलें है जो उनकी धार्मिक रहनुमाई से रोबिनहुडाई तक के सफ़र की कथा बयान करती है.

2009 में पार्टी पर मजबूत पकड़, मठ से प्राप्त धार्मिक हैसियत, विकास और हिन्दू युवा वाहिनी जैसे युवाओ के संगठन के बदौलत उन्होंने करिश्माई रूप से स्वयं की गोरखपुर शहर व् कांग्रेस के दिग्गज महावीर प्रसाद को कमलेश पासवान से हरवा कर बांसगांव लोकसभा सीट जीत ली.आदित्यनाथ भाजपा के टिकट पर सिर्फ चुनाव लड़ते हैं, और पार्टी की भी राज्य में अपने घटी हैसीयत के कारण उनकी ब्रांड वाली राजनीति को बाबूलाल कुशवाहा की तरह मजबूरन स्वीकारना पड़ता है. वे पार्टी की सांगठनिक गतिविधियों में हस्तक्षेप करके उसके पदों पर अपने समर्थकों को तो बिठाते हैं पर भाजपा संगठन की बनिस्बत वे अपने जन कार्यक्रम  हिन्दू युवा वाहिनी और हिन्दू महासभा के बैनर तले चलाते हैं. हालंकि नितिन गडकरी के मौजूदा  कार्यकाल में पार्टी पर उनकी पकड़ कुछ ढीली पड़ी है. पार्टी में धीरे धीरे उनकी उपेक्षा भी शुरू हो गयी है हुई मसलन इन चुनावो के मद्देनज़र पिछले नवम्बर माह में राजनाथ सिंह ने जो सद्भावना यात्रा गोरखपुर में की उसमे उन्होंने योगी को बुलाना तक उचित नहीं समझा, फिर पार्टी ने उनकी युवा वाहिनी की अपेक्षा राजनैतिक लोगो को उनके प्रभाव वाले इलाको में टिकट दे दिए. गडकरी ने बाद में बयान दिया की कुछ बड़े नेता अपनी मनमानी कर जितने वाले कार्यकर्ताओ की अपेक्षा अपने समर्थको को टिकट देने का मुझ पर काफी दबाव बना रहे है. स्वजातीय राजपूत नेता व् भाजपा के प्रदेशाध्यक्ष सूर्यप्रताप शाही व् गोरखपुर शहर के पूर्व विधायक शिव प्रताप शुक्ल से उनकी रार किसी से छुपी नही




Thursday, 11 September 2014

गढ़वाल राइफल्स के स्वर्णिम इतिहास से मिला जनरल बकरा -प्राणी कोई भी हो उसका स्वरूप कुछ भी हो, परन्तु आत्मा एक ही होती है,


गढ़वाल राइफल्स के स्वर्णिम इतिहास से मिला जनरल बकरा का किस्सा सुनने से जितना अटपटा सा लगता है वास्तविकता में यह किस्सा उतना ही रोचक है। बात हिन्दुस्तान आजाद होने से पहले की है। लैन्सडाउन में उस समय गढ़वाल राइफल का ट्रेनिंग सेन्टर हुआ करता था। गढ़वाल राइफल के सभी महत्वपूर्ण फैसले उस समय अंग्रेजी हुकूमत के द्वारा लिये जाते थे। उस समय फ्रांस, जर्मन, बर्मा, अफगानिस्तान आदि देशों से अंग्रेजी शासन का युद्ध होता रहता था अत: गढ़वाल राइफल की पल्टन को भी हुकूमत के शासन के अनुसार उन स्थानों पर जंग में शामिल होना होता था। गढ़वाली जवान इस समय जहां जहां भी जंग पर भेजे जाते थे अपनी वीरता की धाक जमाकर आते थे।

ऐसे ही एक समय अफगानिस्तान के विद्रोह को दबाने के लिये अन्य सैनिक टुकड़ियों के साथ "गढ़वाल राइफल" के जवानों को अफगानिस्तान के "चित्राल" क्षेत्र में भेजा गया। चित्राल अफगानिस्तान पहुंचने पर कमांडर ने जवानों को नक्शा समझाया और टुकड़ियों को अलग अलग दिशाओं से आगे बढ़ने को कहा। सभी टुकड़ियों को एक बहुत बड़े क्षेत्र को घेरते हुये आगे बढ़ना था और एक स्थान पर आगे जाकर मिलना था। वहां के बीहड़ तथा अन्जान प्रदेश में गढ़वाली पल्टन की एक पलाटून टुकड़ी दिशा भ्रम के कारण रास्ता भटक गई तथा घनघोर बीहड़ स्थल में फंस गई। अन्जान जगह और इस ये संकट, स्थिति बड़ी विकट थी।

कई दिनों तक भटकने के बाद जवानों का बुरा हाल था। भूख और प्यास की वजह से हालत पस्त होती जा रही थी। वे लोग शत्रु प्रदेश में होने के कारण दिन भर भूखे प्यासे झाड़ियों में छिपे रहते और रात को छुपते-छुपाते रेंगते हुये आगे बढ़कर मार्ग ढूंढते थे। ऐसे ही एक रात थके भटके सिपाही शत्रुओं से बचते-बचाते अपना मार्ग ढूंढने में लगे थे तभी उन्होने सामने की झाड़ियों में अपनी तरफ बढ़ती कुछ हलचल महसूस की। झाड़ियों कोइ चीरकर अपनी तरफ बढ़ते शत्रुओं के भय से हिम्मत, साहस और शक्ति आ गई । सभी ने अपनी बन्दूकें कस कर पकड़ लीं और ग्रुप कमान्डर के इशारे के आदेश से आक्रमण करने को तैयार सांस बांधे और बन्दूक साधे झाड़ियों की तरफ टकटकी लगाये खड़े हो गये। रात्रि के अन्धकार में शत्रु की सटीक स्थिति एवं संख्या का अंदाजा लगा पाना मुश्किल था लेकिन फिर भी सभी मजबूती से बन्दूकें पकड़े चौकन्ने खड़े थे। लेकिन आने वाल जब झाड़ियों से बाहर निकलकर उनके सामने निर्भय हो आ खड़ा हुआ तो सबकी सांस में सांस आई, बन्दूकों पर पकड़ ढीली पड़ गई और भूख भी लौट आई।

जिसको शत्रु समझकर वे आक्रमण की तैयारी कर खड़े हो चुके थे वो एक भीमकाय जंगली बकरा था जो सामने चुपचाप खड़ा उनको देख रहा था। वह बकरा बड़ा शानदार था, उसके बड़े सींग और लम्बी दाढ़ी उसकी आयु का परिचय दे रहे थे तथा वह एक सिद्धप्राणी देवदूत सा खड़ा सिपाहियों की गतिविधियां देख रहा था। अजनबी देश में भटके वे सिपाही कई दिनों से भूखे थे। उन्होने बकरे को घेर कर पकड़ कर खाने की बात आपस में तय की तथा उसे पकड़ने के लिये घेराबन्दी करने लगे। बकरा भी चुपचाप खड़ा उन्हे देखता रहा।

जब बकरे ने देखा कि सिपाही उसकी तरफ आ रहे हैं तो वह जैसे खड़ा था वैसे ही उल्टे पैर सिपाहियों पर नजर गढ़ाये जिधर से आया था उधर को उल्टा पीछे चलने लगा। धीरे धीरे पीछे हटते बकरे की तरफ सिपाही मन्त्रमुग्ध से होकर चाकू हाथ में थामें बढ़ते रहे। काफी दूर तक चलते चलते बकरा उनको एक बड़े खेत में ले आया था वहां आकर बकरा खड़ा हो गया। सिपाहियों ने  बकरे को घेर लिया लेकिन तभी बकरे ने अपने पीछे के पावों से मिट्‌टी को खोदना शुरू किया थोड़ी ही देर में मिट्‌टी से बड़े बड़े आलू निकल कर बाहर आने लगे। खेत से आलुओं को निकलता देखकर सिपाहियों समझ गये कि यह बकरा भी हमारी भूख और मन की व्यथा को समझ रहा था। उसने हमारी छटपटाती भूख को देखकर हमारे जीवन की रक्षा का उपाय सोचा और सोचने के बाद वह मूक प्राणी किस तरह हमें खेत तक ले गया। वह यह भी देख रहा था कि ये मारने के लिये हथियार उठाये हुये हैं। बकरे के मूक व्यवहार को देक सभी सिपाही गद्‌-गद्‌ हो उठे, सबने हथियार छोड़ बकरे को गले से लगाया।

 उसके बाद सिपाहियों ने बकरे के खोदे हुये आलुओं को इकट्ठा कर भूनकर खाया। पेट भर कर उनमें नई शक्ति का संचार हुआ तथा वे अपने गंतव्य की ओर अग्रसर हुये। कुछ दूर चलकर उनको अपने साथी भी मिल गये। निर्धारित स्थान पर आक्रमण कर गढ़वाली पल्टन विजयी हुई। लौटते समय सैनिक वहां से जीत के माल, तोप, बन्दूक, बारूद के साथ उस भीमकाय बकरे को भी लैन्सडौन छावनी में ले आये।

गढ़वाल राईफल्स की लैन्सडौन छावनी में विजयी सैनिकों का सम्मान हुआ। उनके साथ ही उस बकरे का भी सम्मान किया गया क्योंकि युद्ध में उसने पलाटून के सभी जवानों की जीवन रक्षा की थी अत: उस बकरे को "जनरल" की उपाधि से सम्मानित किया गया। वह बकरा भले ही "जनरल" पद की परिभाषा तथा गरिमा ना समझ पाया हो लेकिन वह परेड ग्राउन्ड में खड़े सैनिकों, आफिसरों के स्नेह को देख रहा था, सभी उस पर फूल बरसा रहे थे। विशाल बलिष्ठ शरीर, लम्बी दाढ़ी वाला वह "जनरल बकरा" फूलमालाओं से ढका एक सिद्ध संत सा दिख रहा था। सैनिकों ने उसका नाम प्यार व सम्मान से "बैजू" रख दिया था। उस जनरल बकरे को पूरे फौजी सम्मान प्राप्त थे, उसे फौजी बैरिक के एक अलग क्वाटर में अलग बटमैन सुविधायें दी गईं थी।

उसकी राशन व्यवस्था भी सरकारी सेवा से सुलभ थी उस पर किसी तरह की कोई पाबन्दी नहीं थी, वह पूरे लैन्सडौन शहर में कहीं भी घूम सकता था। आर० पी० सैनिक उसकी खोज खबर रखते थे। शाम को वो या तो खुद ही आ जाता या उसको ढूंढकर क्वाटर में ले जाया जाता था। बाजार की दुकानों के आगे से वो जब गुजरता था तो उसकी जो भी चीज खाने की इच्छा होती थी खा सकता था चना, गुड़, जलेबी, पकौड़ी, सब्जी कुछ भी। किसी चीज की कोई रोक टोक नहीं थी, उस खाये हुये सामान का बिल यदि दुकानदार चाहे तो फौज में भेजकर वसूल कर सकता था। अपने बुढ़ापे तक भी वह "जनरल बकरा" बाजार में रोज अपनी लंबी-लंबी दाढ़ी हिलाते हुये कुछ ना कुछ खाता तथा आता जाता रहता था। नये रंगरूट भी उसे देखकर सैल्यूट भी ठीक बूट बजाकर मारते दिखते थे, ऐसा क्यों ना हो वह जनरल पद से सम्मानित जो था।

लम्बी दाढ़ी अजीब सी गन्ध लेकर वह जनरल बकरा रोज दिन से शाम तक लैन्सडौन बाजार की गलियों में घूमता दिखाई देता था। फिर वृद्धवस्था के कारण एक दिन वो मर गय। उसकि मृत्यु पर फौज व बाजार में शोक मनाया गया। जनरल बकरा मर कर भी दुनिया को एक संदेश दे गया। "प्राणी कोई भी हो उसका स्वरूप कुछ भी हो, परन्तु आत्मा एक ही होती है, मनुष्य ही नहीं जानवर भी दिल रखते हैं.. प्यार करते हैं, परोपकार की भावना उनमें भी मानव से कम नहीं होती बल्कि उनसे अधिक होती है..."।
..... ऐसा था "जनरल बकरा"

Monday, 8 September 2014

सुरकण्डा देवी-यहां कदम रखते ही मन पवित्र अनुभूतियों से भर जाता है-श्रद्धा से शीश झुक जाता है।




सुरकण्डा देवी शक्तिपीठ गढवाल का प्रसिद्ध शक्तिपीठ है। मान्यता है कि 52 शक्तिपीठों में यह बहुत ही महत्वपूर्ण शक्तिपीठ है। वैदिक कथाओं के अनुसार देवी सती के सिर वाला भाग यहां पर गिरा था, इसलिए इस स्थान को सुरकुट पर्वत के नाम से भी जाना जाता है और यह शक्तिपीठ सुरकंडा के नाम से प्रसिद्ध है। यह शक्ति का स्थल है। सुरकण्डा देवी मन्दिर के पास में ही शिव, भैरव और हनुमान मन्दिर भी हैं।

केदारखंड में जिन 52 शाक्तिपीठों का जिक्र किया गया है दरअसल सुरकण्डा देवी उन्हीं मे से  एक है। इसे सुरेश्वरी के नाम से भी जाना जाता है। आज जिस पर्वत शिखर पर यह मंदिर स्थित है उसे सुरकूट पर्वत भी कहा जाता है। मंदिर के पुजारी ज्ञानदेव लेखवार बताते हैं कि  श्जब राजा दक्ष प्रजापति ने यज्ञ का आयोजन किया तो उसमें अपने दामाद भगवान शंकर को छोड़ सभी देवाताओं को आमंत्रित किया गया, लेकिन फिर भी दक्ष पुत्री सती यज्ञ में शामिल होने पहुंच गई। भगवान शंकर को न बुलाए जाने का कारण पूछे जाने पर राजा दक्ष ने महादेव के लिए अपमान भरे शब्द कहे। सती शब्दों के इन तीक्ष्ण बाणों को सहन न कर सकी और धधकते हवन कुंड में अपने प्राणों की आहुति दे दी। रौद्र रूप धर भगवान शंकर ने वहां पहुंच शव को त्रिशूल पर लटका हिमालय की ओर रूख किया  उसी दौरान जहां जहां सती के अंग गिरे वे सिद्वपीठ कहलाए। इसी सुरकूट पर्वत पर मां का सिर गिरा था, जो आज सुरकुण्डा देवी मंदिर के रूप में  जाना जाता है। इसके अलावा इसी स्थान पर कभी देवराज इंद्र ने भी घोर तपस्या की थी।

यह शक्तिपीठ मसूरी और चम्बा के बीच स्थित है। धनोल्टी से छह किलोमीटर दूर कद्दूखाल नाम की एक जगह है जहां से सुरकण्डा देवी के लिये रास्ता जाता है। यहां से दो किलोमीटर पैदल चलना पडता है। कद्दूखाल जहां 2490 मीटर की ऊंचाई पर है वहीं सुरकण्डा देवी की ऊंचाई 2750 मीटर है यानी दो किलोमीटर पैदल चलकर 260 मीटर चढना कठिन चढाई में आता है।

इसकी दूर- दूर तक मान्यता है। यहां कदम रखते ही मन पवित्र अनुभूतियों से भर जाता है, श्रद्धा से शीश झुक जाता है। सारे वातावरण में हवन का सुगंध ब्याप्त रहता है । मंदिर में देवी की आरती के समय अद्भुत दृश्य होता है। यहां मॉ की पूजा-अर्चना कर एक अद्भुत शान्ति की प्राप्त होती है।

वैसे तो मंदिर में देवी दर्शन के लिए लोगों का आना-जाना लगा रहता है  लेकिन गंगा दशहरे के अवसर पर देवी के दर्शनों का विशेष महत्व होता है। गंगा दशहरा के अवसर पर यहां विभिन्न जगहों से आए श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है। इस दौरान आस-पास के गांवों समेत दूर-दराज के श्रद्धालु भी ख्रासी संख्या में मौजूद रहते हैं । इसलिए तीन चार दिनों तक मंदिर में अधिक भीड़ रहती है। कतारों में लगे भक्त देर शाम तक माता के दर्शन करते हैं । श्रद्धालु पूरे भक्तिभाव से माता के दर्शन लाभ अर्जित करते हैं। इन दिनों में एक लाख से अधिक श्रद्धालु देवी के दर्शन करते हैं। श्रद्धालु मां का दर्शन कर पुण्य लाभ कमाते हैं और संपन्नता व खुशहाली की मन्नत मांगते हैं ।

इस अवसर पर कद्दूखाल में एक मेले का आयोजन किया जाता हैं । इस मेले में भी भारी भीड़ देखने को मिलती है। इस दौरान कई गांवों के लोग अपने ईष्टदेवों की डोली भी लेकर यहां आते हैं।

नवरात्रि में भी श्रद्धालु यहां पर आकर देवी की कृपा प्राप्त करते है। इन दिनों में यहां पर विशेष पूजा अर्चना की जाती है। अखंड देवी पाठ रखे जाते हैं और वैदिक मंत्रोच्चारण के साथ हवन इत्यादि की जाती है।
हाल ही में प्राचीन मंदिर का जीर्णोद्धार कर नया मंदिर बनाया गया है,  पर खास बात यह है कि मंदिर के स्वरूप को पौराणिक ही रखा गया है। मंदिर में 42 खिड़कियां और 7 दरवाजे बनाए गए हैं। पहाड़ की लोक कला को ध्यान में रखते हुए दरवाजों पर नक्काशी का कार्य भी किया गया है। मंदिर की पौराणिकता को देखते हुए छत्त को पठाली स्लेट से बनाया गया है।

मंदिर से हिमालय का अद्भुत दृश्य देखने को मिलता है। यहां से गढवाल हिमालय की चोटियां दिखती हैं। पीछे मुडकर देखें तो पहाड धीरे धीरे नीचे होते चले जाते हैं, दक्षिण दिशा में ऋषिकेश और देहरादून भी दिखता  है।


कहां ठहरें- 
अगर आप मसूरी में अपना होटल न छोड़ना चाहें तो एक दिन में आप अप डाउन कर सकते हैं। क्योंकि कद्दूखाल से मसूरी की दूरी महज 35 किमी है। अगर आप सुबह शाम होने वाली पूजा में शामिल होना चाहते हैं तो मंदिर प्रबंधन की  धर्मशालाओं में भी ठहर सकते हैं। मगर इनमें अधिक सुविधाओं की उम्मीद न करें। इन सब के अलावा कद्दूखाल से 8 किमी की दूरी पर धनोल्टी में आपको गढ़वाल मंडल विकास निगम की डोमेट्ररी से लेकर सुपर डीलक्स रूम तक मिल जाएंगे।

कैंसे पहुंचेः
 यह स्थान दिल्ली से लगभग 315 किमी. की दूरी पर है। आप दिल्ली से मसूरी वाया देहारदून होते हुए सुरकण्डा पहुंच सकते हैं। अगर आप अपने वाहन से जाने की सोच रहे हैं तो जरूरी नहीं कि मसूरी भी होते हुए जाएं क्योंकि देहरादून से आगे बढ़ने पर मसूरी से  2 किमी पहले ही एक रास्ता सुरकण्डा की ओर निकल जाता है। 

Sunday, 31 August 2014

धारी देवी -पहाड़ों और तीर्थयात्रियों की रक्षक देवी माना जाता है -यहां उनके धार की पूजा होती है





बदरीनाथ राष्ट्रीय राजमार्ग पर श्रीनगर से करीब 15 किलोमीटर की दूरी पर कलियासौड़ में अलकनन्दा नदी के किनारे सिद्धपीठ माँ धारी देवी का मंदिर स्थित है । माँ धारी देवी प्राचीन काल से उत्तराखण्ड की रक्षा करती है, सभी तीर्थ स्थानों की रक्षा करती है । माँ धारी देवी मंदिर का इतिहास बहुत पुराना है । वर्ष 1807 से इसके यहां होने का साक्ष्य मौजूद है । पुजारियों और स्थानीय लोगों का मानना है कि मंदिर इससे भी पुराना है । 1807 से पहले के साक्ष्य गंगा में आई बाढ़ में नष्ट हो गए हैं । 1803 से 1814 तक गोरखा सेनापतियों द्वारा मंदिर को किए गए दान अभी भी मौजूद है । बताया जाता है कि ज्योतिलिंग की स्थापना  के लिए जोशीमठ जाते समय आदि शंकराचार्य ने श्रीनगर में रात्रि विश्राम किया था । इस दौरान अचानक उनकी तबीयत बिगड़ने पर उन्होंने धारी माँ की आराधना की थी, जिससे वे ठीक हो गए थे । तभी उन्होंने धारी माँ की स्तुति की थी ।

इस मंदिर में पूजा अर्चना धारी गांव के पंडित कराते हैं । यहां के तीन पंडित भाई (परिवार) चार -चार महीने पूजा कराते हैं । पुजारी का कहना है कि मां की जो इच्छा हो उसे पूरा किया जाए । मां दो बार अपना जवाब सुना चुकी है कि उन्हें यहां से नहीं हटाया जाए । मां की शक्ति है कि 25 साल से यह  पाॅवर प्रोजेक्ट नहीं बन रहा है । मां हम लोगों की रक्षा कर रही है । धारी देवी मंदिर पौड़ी गढ़वाल, श्रीकोट से 15 किलोमीटर दूर कालिया सौड की सड़क है जो एक बार भूस्खलन के लिए जाना जाता है । यद्यपि अभी मानसून के दौरान, भूस्खलन होते रहते हैं पर ये बहुत हद तक सीमित एंव नियंत्रित रहते हैं । इसके अलावा अधिक महत्वपूर्ण एक किलोमीटर की नदी का रास्ता है जो इस क्षेत्र के लोगों की पूजित प्रमुख देवी धारी देवी के काली सिद्धपीठ तक ले जाता है । यहां के पुजारी बताते हैं कि द्वापर युग से ही काली की प्रतिमा यहां स्थित है । ऊपर के काली मठ एवं कालिस्य मठों में देवी काली की प्रतिमा क्रोध की मुद्रा में है पर धारी देवी मंदिर में वह कल्याणी परोपकारी शांत मुद्रा में है । उन्हें भगवान शिव द्वारा शांत किया गया जिन्होंने देवी-देवताओं से उनके हथियार का इस्तेमाल करने को कहा । यहां उनके धार की पूजा होती है जबकि उनके शरीर की पूजा काली मठ में होती है । पुजारी का मानना है कि धारी देवी, धार शब्द से ही निकला है । पुजारी मंदिर के बारे में अन्य कथा का पुरजोर खंडन करता है ।

कहा जाता है कि एक भारी वर्षा की काली रात में जब नदी में बाढ़ का उफान था, धारो गांवके लोगों ने एक स्त्री का रूदन सुना । उस जगह जाने पर उन्हें काली की एक मूर्ति मिली जो बाढ़ के पानी में तैर रही थी । एक दैवी की आवाज ने ग्रामीणों को इस मूर्ति को वही स्थापित  करने का आदेश दिया, यहंा वह मिली थी । ग्रामीणों ने यह भी किया और देवी को धारी देवी नाम दिया गया । पुजारी मानता है कि भगवती काली जो हजारों को शक्ति प्रदान करती है, वह लोगों से अपने बचाव के लिए सहायता नहीं मांग सकती थी । पर वह मानता है कि वर्ष 1980 की बाढ़ में प्राचीन मूर्ति खो गयी तथा 5-6 वर्षो बाद तैराकों द्वारा नदी से मूर्ति को खोज निकाला गया । इस अल्पावधि में एक अन्य प्रतिमा स्थापित  हुई, तथा अब मूल प्रतिमा को पुनस्र्थापित किया गया है । आज देवी की प्राचीन प्रतिमा के चारों ओर एक छोटा मंदिर चट्टान पर स्थित है । प्राचीन देवी की मूर्ति के इर्द-गिर्द चट्टान पर एक छोटा मंदिर स्थित है । देवी की आराधना भक्तों द्वारा अर्तित 50,000 घंटियों बजा कर की जाती है । माँ धारी देवी का मंदिर अलकनंदा नदी पर बन रही 330 मेगावाट जल विद्युत परियोजना की डूब क्षेत्र में आ रहा है । मंदिर समिति के अध्यक्ष एवं समिति के सदस्यों का कहना है कि मंदिर के 200 वर्ष से अधिक होने संबंधी लिखित प्रमाण हैं । ऐसे में अलकनंदा पर बने बांध से बनी झील ने मंदिर के अस्तित्व को संकट में डाल दिया है । धारी देवी माँ  श्मशानी देवी हैं इसलिए मंदिर आगे से खुला होना चाहिए जिससे धारी गांव का पैतृक घाट मंदिर के सम्मुख रहे ।

हटाई माता ‘‘ धारी देवी ’’ की मूर्ति तो उत्तराखण्ड में हुआ ‘‘महाविनाश’’ -इसे चाहें तो अंधविश्वास कहें या महज एक संजोग उत्तराखण्ड में हुई तबाही के लिए जहां लोग प्रशासन की लापरवाही को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं वहीं उत्तराखण्ड के गढ़वाल वासी का मानना है कि माता धारा देवी के प्रकेाप से ये महाविनाश हुआ । मां काली का रूप माने जाने वाली धारा देवी की प्रतिमा को 16 जून 2013 की शाम को उनके प्राचीन मंदिर से हटाई गई थी । उत्तराखण्ड के श्रीनगर में हाइडिल-पाॅवर प्रोजेक्ट के लिए ऐसा किया गया था । प्रतिमा जैसे ही हटाई गई उसके कुछ घंटे के बाद ही केदारनाथ मे तबाही का मंजर आया और सैकड़ो लोग इस तबाही के मंजर में मारे गये  इस इलाके में माँ धारी देवी की बहुत मान्यता है लोगों की धारणा है कि माँ धारी देवी की प्रतिमा में उनका चेहरा समय के बाद बदला है । एक लड़की से एक महिला और फिर एक वृद्ध महिला का चेहरा  बना । पौराणिक धारणा है कि एक बार भयंकर बाढ़ में पूरा मंदिर बह गया था लेकिन माँ धारी देवी की प्रतिमा एक चट्टान से सटी धारो गांव में बची रह गई थी । गावंवालों को माँ धारी देवी की ईश्वरीय आवाज सुनाई दी थी कि उनकी प्रतिमा को वहीं स्थापित  किया जाए , यही कारण है कि माँ धारी देवी की प्रतिमा को उनके मंदिर से हटाए जाने का विरोध किया जा रहा था । यह मंदिर श्रीनगर से 10 किलोमीटर दूर पौड़ी गांव में है । सिर्फ केदारनाथ के मंदिर को छोड़कर । 16 जून 2013 को शाम 6 बजे धारी देवी की मूर्ति को हटाया गया और रात्रि आठ बजे अचानक आए सैलाब ने मौत का तांडव रचा और सबकुछ तबाह कर दिया जबकि दो घंटे पूर्व मौसम सामान्य था ।

श्रीनगर गढवाल क्षेत्र में एक बहुत ही प्राचीन सिद्ध पीठ है जिसे ‘‘ धारी देवी ’’ का सिद्धपीठ कहा जाता है । इसे दक्षिणी काली माता भी कहते हैं । मान्यता अनुसार उत्तराखंड में चारों  धामों की रक्षा करती है ये देवी । इस देवी को पहाड़ों और तीर्थयात्रियों की रक्षक देवी माना जाता है । महा विकराल इस काली देवी की मूर्ति स्थापना  और मंदिर निर्माण की भी रोचक कहानी है । मूर्ति जाग्रत और साक्षात है । समूचा हिमालय क्षेत्र मां दुर्गा और भगवान शंकर का मूल निवास स्थान माना जाता है । इस स्थान पर मानव के जब से अपनी गतिविधियां बढ़ाना शुरू की हैं तब से जहां प्राकृतिक आपदाएं बढ़ गईं हैं वहीं यह समूचा क्षेत्र अब ग्लेशियर की चपेट में भी आने लगा है । लेकिन नदी पर बांध बनाने के चक्कर में सरकार ने इस देवी के मंदिर को तोड़ दिया और मूर्ति को मूल स्थान से हटाकर अन्य जगह पर रख दिया । 

Tuesday, 26 August 2014

जागर - उत्तराखंड में देवताओं के आह्वान का पवित्र अनुष्ठान





सभी जानते हैं कि उत्तराखंड प्रदेश को देवभूमि के नाम से भी जाना जाता है, ऐसा माना जाता है कि इस अंचल के कण-कण में देवी देवता निवास करते हैं। उत्तराखण्ड देवाधिदेव महादेव भगवान् शिव का घर (कैलाश पर्वत) भी है और ससुराल (कनखल, हरिद्वार) भी हमारे वेद-पुराणों में भी सभी देवी-देवताओं का निवास हिमालय के उत्तराखण्ड अंचल में ही माना गया है। उत्तराखण्ड में शिव मन्दिर प्रायः हर स्थान पर पाए जाते है इसीलिए यहाँ के बारे में कहा जाता है कि, "जितने कंकर, उतने शंकर"। सभी हिंदू देवी देवताओं की आराधना के साथ साथ यहाँ पर स्थानीय रूप से पूजे जाने वाले कई देवी-देवताओं का भी यहाँ की संस्कृति में महत्वपूर्ण स्थान है

जागर शुद्ध संस्कृत शब्द है जो जाग के साथ घल् प्रत्यय लगाकर बना है उसका अर्थ है जागरण उत्तराखंडवासियों का ऐसा विश्वास है कि देवी-देवता अपने भक्तों का हर कष्ट का निवारण करने के लिये हमारे पास आते हैं देवताओं की की आत्मा के किसी पवित्र शरीर के माध्यम से कुछ समय के लिए अवतरित होने की इसी प्रक्रिया को कहा जाता है- "जागर"। जागर शायद जागरण का ही अपभ्रंश हो सकता है क्योंकि जागर का आयोजन सामान्यतया रात्रि में ही होता है। लेकिन जिस रूप में इसका आयोजन किया जाता है उसके अनुसार जागर से अभिप्राय एक ऎसे रात्रि जागरण या जगराते के आयोजन से है जहां एक अदृश्य आत्मा (देवी-देवताओं) को जागृत कर उसका आह्वान कर उसे किसी व्यक्ति के शरीर में अवतरित किया जाता है।

इस प्रकार गूढ़ अर्थ में जागरण से अभिप्राय केवल जागने से ना होकर देवता की आत्मा को जागृत करने तथा उसे किसी व्यक्ति में (जिसे डंगरिया कहते हैं) में अवतरित कराने से है। इस कार्य के लिये जागरिया जागर लगाता है तथा देवता के आह्ववान हेतु देवता की जीवनी और उसके द्वारा किये कार्यों का बखान अपने साथी गाजे बाजे वालों के साथ गाते हुये करता है। जगर में वाद्य यंत्रों के रूप में हमारे लोक वाद्य हुड़्का और कांसे की थाली का प्रमुख रुप से प्रयोग किया जाता है। इन गीतों को जागर कहने का तर्क यह है कि इनमें देवी शक्ति को जाग्रत करने का आह्वान होता है, इसलिये इनका प्रारंभ जागने-जगाने के उद्बोधन से होता है
अवधि के अनुसार जागर कई प्रकार की होती है:-

सामान्य जागर एक दिन (रात्रि में) की होती है

विशेष प्रयोजन हेतु चार दिन तक आयोजित की जाने वाली जागर के इस कार्यक्रम को चौरास कहते हैं। बैसी- बाईस दिन लगातार आयोजित की जागर के कार्यक्रम को बैसी कहते हैं। यह किसी बड़े परिवारसमूह के द्वारा सामूहिक रूप से आयोजित की जाती है
स्थान के अनुसार जागर घर के अंदर तथा घर के बाहर या मंदिरों में बने विशेष स्थल पर आयोजित की जाती है
आयोजित किए जाने उद्देश्य के अनुसार जागर दो प्रकार की होती है:

एक जागर जो जिसका आयोजन देवी देवताओ या अपने ईष्ट की आराधना के लिए होता है
दूसरी जागर किसी मृत आत्मा (जैसे के किसी पूर्वज जिसकी अकाल मृत्यु हुयी हो और अंतिम संस्कार विधिपुर्वक न हुआ हो) की शान्ति के लिए!

जागर के संचालन में मुख्य रुप से निम्न लोग शामिल होते है:-
१- जगरिया या धौंसिया
२- डंगरिया
३- स्योंकार-स्योंने या सोंकार
४- गाजेबाजे वाले - जो जगरिया के साथ गायन में तथा वाद्ययंत्रों के संगीत से सहयोग करते हैं।

इनके अतिरिक्त स्योंकार के घर के अन्य सदस्य, सम्बन्धी, मित्रगण व गांव पड़ोस के लोग भी जागर में दर्शक की तरह शामिल होते हैं तथा देवता से आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।

जगरिया या धौंसिया-
जगरिया या धौंसिया उस व्यक्ति को कहा जाता है जो अदृश्य आत्मा को जागृत करता है, इसका कार्य देवता की जीवनी, उसके जीवन की प्रमुख घटनायें व उसके प्रमुख मानवीय गुणों को लोक वाद्य के साथ एक विशेष शैली में गाकर देवता को जागृत कर उसका अवतरण डंगरिया से शरीर में कराना होता है।यह देवता (जोकि डंगरिया के शरीर में अवतरित होते हैं) को प्रज्जलित धूनी के चारों ओर चलाता है और उससे जागर लगवाने वाले की मनोकामना पूर्ण करने का अनुरोध करता है। यह कार्य मुख्यतः हरिजन लोग करते हैं और यह समाज का सम्मानीय व्यक्ति होता है, इसके लिये जागर लगवाने वाला व्यक्ति नये वस्त्र और सफेद साफा लेकर आता है और यह उन्हें पहन कर यह कार्य करता है। जगरिया को भी खान-पान और छूत आदि का भी ध्यान रखना होता है।
डंगरिया, पश्वा या धामी-
डंगरिया वह व्यक्ति होता है, जिसके शरीर में देवता का अवतरण होता है, इसे डगर (रास्ता) बताने वाला माना जाता है, इसलिये इसे डंगरिया कहा जाता है। जब डंगरिया के शरीर में देवता का अवतरण हो जाता है है तो उसका पूरा शरीर कांपता है और वह सभी दुःखी लोगों की समस्याओं के समाधान बताता है, उसे उस समय देवता की तरह ही शक्ति संपन्न और सर्वफलदायी माना जाता है।
डंगरिया को गढ़वाल तथा कुछ अन्य स्थानों पर ’पस्वा’ या ’धामी’ भी कहा जाता है यह भी देखा गया है कि धामी बनने का यह रिवाज पीढी दर पीढी चलता है अर्थात धामी की उमर हो जाने पर वही देवता धामी के पुत्र पर या परिवार के किसी अन्य सदस्य पर अवतरित होने लगता है धामी या पस्वा लोगो को कई तरह के परहेज रखने होते हैं सामान्यत: धामी लोग हाथ में “कङा” पहनते हैं, देवता शरीर में अवतरण से पहले और देवता के शरीर को मुक्त कर देने के बाद धामी सामान्य मनुष्य की तरह व्यवहार करने लगते हैं।
डंगरिया या धामी को समाज में मह्त्वपूर्ण स्थान दिया जाता है और सभी उसका आदर और सम्मान करते हैं। इस व्यक्ति की दिनचर्या हमारी तरह सामान्य नहीं होती, उसे रोज स्नान ध्यान कर पूजा करनी होती है, वह सभी जगह खा-पी नहीं सकता। यहां तक कि चाय पीने के लिये भी विशेष ध्यान उसे रखना होता है। उसे हमेशा शुद्ध ही रहना होता है अन्यथा देवता कुपित हो जाते हैं और उस व्यक्ति को दण्ड देते हैं ऎसी मान्यता है। जागर के वक्त भी डंगरिया गो-मूत्र, गंगाजल और गाय के दूध का सेवन कर, शुद्ध होकर ही धूणी में जाते हैं।

स्योंकार-स्योंनाई-

जिस घर में या घर के लोगों द्वारा जागर आयोजित की जाती है, उस घर के मुखिया को स्योंकार या सोन्कार और उसकी पत्नी को स्योंनाई कहा जाता है। यह अपनी समस्या देवता को बताते हैं और देवता के सामने चावल के दाने (जिसे दाणी भी कहते) रखते हैं, देवता चावल के दानों को हाथ में लेकर उनकी समस्या के बारे में जान लेते हैं और उसकी समस्या का कारण तथा समाधान बताते हैं।

जागर के लिये धूणी:-

जागर के लिये धूणी बनाना भी आवश्यक है, इसे बनाने के लिये लोग नहा-धोकर, पंडित जी की अगुवाई में शुद्धतापुर्वक एक शुद्ध स्थान का चयन करते हैं तथा वहां पर गौ-दान किया जाता है। फिर वहां पर गोलाकार भाग में थोड़ी सी खुदाई करके गड्ढा सा बना दिया जाता है जिससे वहां पर राख को एकत्र किया जा सके और वहां पर जलाने के लिए लकड़ियां रखी जाती हैं। लकड़ियों के चारों ओर गाय के गोबर और दीमक वाली मिट्टी ( यदि उपलब्ध न हो तो शुद्ध स्थान की लाल मिट्टी) से उसे लीपा जाता है। फ़िर धूणी में जागर लगाने से पहले स्योंकार द्वारा दीप जलाया जाता है, फिर शंखनाद कर धुणी को प्रज्जवलित किया जाता है। इस धूणी में तथा जागर लगने वाले स्थान पर किसी भी अशुद्ध व्यक्ति के जाने और जूता-चप्पल लेकर जाने का निषेध होता है।

जागर के संचालन का मुख्य कार्य जगरिया करता है और वह अपने व सहयोगियों के गायन-वादन से जागर 
को निम्न आठ चरणों (भागों) में पूर्ण कराता है:-
१- प्रथम चरण - सांझवाली गायन (संध्या वंदन)
२- दूसरा चरण- बिरत्वाई गायन (देवता की बिरुदावली गायन)
३- तीसरा चरण- औसाण (देवता के नृत्य करते समय का गायन व वादन)
४- चौथा चरण- हरिद्वार में गुरु की आरती करना
५- पांचवा चरण- खाक रमण
६- छठा चरण- दाणी का विचार करवाना
७- सातवाँ चरण आशीर्वाद दिलाना, संकट हरण का उपाय बताना, विघ्न-बाधाओं को मिटाना
८- आठवां चरण- देवता को अपने निवास स्थान कैलाश पर्वत और हिमालय को प्रस्थान कराना

१- प्रथम चरण - सांझवाली गायन (संध्या वंदन)

जागर के प्रथम चरण में जगरिया हुड़्के या ढोल-दमाऊं के वादन के साथ सांझवाली का वर्णन करता है, इस गायन में जगरिया सभी देवी-देवताओं का नाम, उनके निवास स्थानों का नाम और संध्या के समय सम्पूर्ण प्रकृति एवं दैवी कार्यों के स्वतः प्राकृतिक रुप से संचालन का वर्णन करता है। सांझवाली गायन बड़ा लम्बा होता है, जिसे जगरिया धीरे-धीरे गाते हुये पूर्ण करता है। जब जागर का प्रथम चरण, सांझवाली पूर्ण होता है, इसे जगरिया द्वारा हुड़्के या ढोल-दमाऊं पर गाया जाता है। जगरिया वैसे तो कम पढ़ा लिखा या नितान्त अनपढ़ ही होता है, लेकिन अगर हम उसके द्वार गाई जाने वाली सांझवाली का विवेचन करें तो पता चलता है कि वह अन्तर्मन से कितना समृद्ध है। उसकी सांझवली का विस्त्तार तीनों लोकों तक है, जिसमें प्रकृति, ईशवर और हमारे स्थानीय देवताओं के विभिन्न स्वरुपों का विराट रुप में वर्णन है।

२- द्वितीय चरण- बिरत्वाई

इस चरण में जिस देवता की जागर लगाई जाती है या जिस देवता का आह्वान किया जाता है, उस देवता की उत्पत्ति, जीवनी और उसके द्वारा किये गये उन महत्वपूर्ण कार्यों का विवरण जगरिया अपने गायन में करता है। जिसे बिर्त्वाई कह्ते हैं अगर हम बिर्त्वाई शब्द के मूल में जायें तो इसका अर्थ वीरता प्रतीत होता है, क्योंकि इसमें देवता की वीरता का बखान इस प्रकार किया जाता है कि उसे सामान्य स्तर के व्यक्ति से ऊपर उठाकर देवता बना दिया। इस प्रकार देवता को आह्वानित किया जाता है और जब बिरत्वाई अपने अंत पर पहुंचती है तो डंगरिया के शरीर में कम्पन होने लगता है, इसका अर्थ है कि उसके शरीर में देवता का अवतरण हो शुरु हो गया है, अब जगरिया बिरुदावली को बंद कर औसाण देने लगता है।
३- तृतीय चरण- औसान

इस समय तक डंगरिया के शरीर में देवता की आत्मा का प्रवेश हो चुका होता है तथा देवता को नाचने हेतु प्रेरित करने के लिए जगरिया औसाण देता है। औसान देते समय हुड़्के या अन्य वाद्य यंत्रो की गति बढ़ जाती है, औसान के सन्गीत से मन्त्रमुग्ध होकर देवता अपने पूर्णरुप एवं शक्ति के साथ धूणी के चारों ओर नाचने लगता है। औसाण का हर शब्द देवता में जोश पैदा करता है, इस समय डंगरिया ऎसे ऎसे कार्य कर देता है, जो वह अपने एक साधारण मनुस्य के वास्तविक रूप में कभी भी नही कर सकता। इसी से यह महसूस होता है कि डंगरिया के शरीर में कोई दिव्या शक्ति या देवात्मा प्रवेश कर जाती है।

४- चौथा चरण- गुरु की आरती 

इस चरण में देवता द्वारा गुरु की आरती की जाती है, ऎसा माना जाता है कि हमारे सभी लोकदेवता पवित्र आत्मायें हैं। गुरु गोरखनाथ इनके गुरु हैं और इन सभी देवताओं ने कभी न कभी हरिद्वार जाकर कनखल में गुरु गोरखनाथ जी से दीक्षा ली है। तभी इनको गुरुमुखी देवता कहा जाता है, इस प्रसंग का वर्णन जगरिया अपने गायन द्वारा देवता के समक्ष करता है। इस समय नृत्य करते समय देवता के हाथ में थाली दे दी जाती है और थाली में चावल के दाने, राख, फूल और जली हुई घी की बाती रख दी जाती है, देवता नृत्य करते हुये थाली पकड़्कर अपने गुरुजी की आरती करते हैं।

५- पांचवा चरण- खाक या भिभूति (भभूत) रमाना 

जागर के इस चरण में खाक रमाई जाती है, अपने गुरु की आरती के उपरान्त देवता द्वारा धूणी से राख निकाली जाती है। उसके बाद थाली में रखी हुई राख को देवता सबसे पहले अपने माथे पर लगाते हैं, उसके बाद जगरिया को फिर वाद्य यंत्रों पर राख लगाते हैं। इसके बाद वहां पर बैठे लोग क्रम से देवता के पास जाते हैं और देवता उनके माथे पर राख (भिभूत) लगाकर उनको आशीर्वाद देते हैं।

६- छठा चरण- दाणि का विचार
सभी को भिभूति लगाने के बाद जागर के छठे चरण में देवता स्योंकार की दाणि का विचार करते हैं। दाणी का विचार से मतलब है, जिस घर में देवता का अवतरण किया गया है, उस घर की परेशानी का कारण क्या है? इसी बात पर देवता विचार करते हैं, वह हाथ में चावल के दाने(दाणी) लेकर विचार करते हैं और परेशानी का कारण और उसका समाधान भी बताते हैं।

७- सातवां चरण- आशीर्वाद देना 
स्योंकार-स्योंनाई की दाणी के विचार के बाद जागर के सातवें चरण में देवता स्योंकार-स्योंनाई को आश्वस्त करते हैं कि उन्होने उनके सभी कष्टों को अभी से हर लिया है। उनकी जागर की सफ़ल हुयी है तथा प्रसन्न होकर देवता द्वारा उनके सुखी पारिवारिक जीवन के लिये आशीर्वाद दिया जाता है। वहां पर बैठे सभी लोगों के लिये भी देवता मंगलकामना करते हुये उनको अशीर्वाद देते हैं।

८- आठवां चरण- देवता का अपने निवास के लिये प्रस्थान करना
यह चरण जागर का अंतिम चरण होता है, क्योंकि जिस कार्य के लिये जागर लगाई गई थी वह कार्य पूरा हो जाता है। देवताओं को सूक्ष्मरुपधारी माना गया है और ऎसा माना जाता है कि सभी देवता हिमालय में निवास करते हैं। अतः जगरिया अब अंतिम औसाण (अवसान) देता है और देवता अंतिम बार नाचते हैं और नाचते हुये खुशी खुशी अपने धाम की ओर वापस चले जाते हैं। जगरिया से वह इस बात का वादा करते हैं कि जब भी स्योंकार-स्योंनाई पर संकट होगा, उसके निवारण हेतु वह जरुर आयेंगे।देवता के अपने निवास को प्रस्थान के बाद देवता की आत्मा डंगरिया के शरीर को मुक्त कर देती है। इसके बाद डंगरिया के शरीर में कम्पन बंद हो जाता है और उनका शरीर निढ़ाल सा हो जाता है। थोडी देर लेटे रहने के बाद उन्हें फिर से गंगाजल, गो-मूत्र दिया जाता है, उसके बाद वह सामान्य रुप में आ जाते हैं। यह बड़े आश्चर्य का विषय है कि जागर के समाप्त होने के उपरांत वह व्यक्ति जिसके शरीर में देवता अवतरित होते हैं (डंगरिया), अपने सामान्य रूप में आ जाता है तथा एक सामान्य मनुष्य की तरह ही व्यवहार करता है।

जागर एक पवित्र अनुष्ठान है, जिसमे यह माना जाता है कि देवताओं की आत्मा मनुष्य के शरीर में कुछ अवधि के लिए आकर आयोजनकर्ता के परिवार को आशीर्वाद प्रदान करती है। इसके आयोजन में साफ सफाई, सुचिता और पतित्रता का विशेष ध्यान रखा जाता है। किसी भी प्रकार की त्रुटि होने या सुचिता का ध्यान न रखे जाने पर देवता के कोप का भागी होना पड़ सकता है।

एक धार्मिक अनुष्ठान के साथ साथ जागर एक समृद्ध संगीत विधा भी है, इसी कारण उत्तराखंड के सभी लोक गायकों द्वारा जागर का गायन भी किया गया है। जिनकी Music CD बाजार में उपलब्ध है और आप इनको खरीदकर जागर के संगीत का आनंद प्राप्त कर सकते हैं। लेकिन यह संगीत मनोरंजन के लिए न होकर भक्ति भावना के साथ गाया और सुना जाता है। सुनने वालों को भी इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए कि इससे लोगों के धार्मिक विश्वास कि ठेस नही पहुंचनी चाहिए। क्योंक जागर एक पवित्र अनुष्ठान है इसलिए इसके गायन में भी उसी प्रकार की पवित्रता और सुचिता रखी जानी चाहिए जैसे उसके आयोजन के समय घरों में रखी जाती है।

आधुनिक पीढी के पढ़े- लिखे लोग अब जागर जैसी परम्पराओं पर कम ही विश्वास करते हैं और इसको अंधविश्वास मानते हैं। लेकिन उत्तराखंड में जागर लगाते हुये जिस प्रकार देवता का आह्वान किया जाता है, इस प्रकार के अनुष्ठान विश्व भर में किसी न किसी समय प्रचलित रहे है। व्यक्ति को माध्यम बना कर दैवीय शक्ति के आह्वान के उदाहरण मिश्र, चीन, जापान, अफ्रीका, ब्राजील आदि कई देशों में भी मिलते हैं। वैसे भी अंधविश्वास और श्रद्धा में बहुत थोडा सा ही अन्तर होता है, जिसे उसको जानने वाला ही महसूस आकर सकता है।

कुमाउंनी संस्कृति के विविध रंग हैं जिनमें से एक है यहां की ‘जागर’। उत्तराखंड में ग्वेल, गंगानाथ, हरू, सैम, भोलानाथ, कलविष्ट आदि लोक देवता हैं और जब पूजा के रूप में इन देवताओं की गाथाओं का गान किया जाता है उसे जागर कहते हैं। जागर का अर्थ है ‘जगाने वाला’ और जिस व्यक्ति द्वारा इन देवताओं की शक्तियों को जगाया जाता है उसे ‘जगरिया’ कहते हैं। इसी जगरिये के द्वारा ईश्वरीय बोल बोले जाते हैं। जागर उस व्यक्ति के घर पर करते हैं जो किसी देवी-देवता के लिये जागर करवा रहा हो।
जागर में सबसे ज्यादा जरूरी होता है जगरिया। जगरिया को ही हुड़का और ढोलक आदि वाद्य यंत्रों की सहायता से देवताओं का आह्वान करना होता है। जगरिया देवताओं का आह्वान किसी व्यक्ति विशेष के शरीर में करता है। जगरिये को गुरू गोरखनाथ का प्रतिनिधि माना जाता है। जगरिये अपनी सहायता के लिये दो-तीन लोगों को और रखते हैं। जो कांसे की थाली को लकड़ियों की सहायता से बजाता है। इसे ‘भग्यार’ कहा जाता है।

जागर में देवताओं का आह्वान करके उन्हें जिनके शरीर में बुलाया जाता है उन्हें ‘डंगरिया’ कहते हैं। ढंगरिये स्त्री और पुरूष दोनों हो सकते हैं। देवता के आह्वान के बाद उन्हें उनके स्थान पर बैठने को कहा जाता है और फिर उनकी आरती उतारी जाती है। जिस स्थान पर जागर होनी होती है उसे भी झाड़-पोछ के साफ किया जाता है। जगरियों और भग्यारों को भी भी डंगरिये के निकट ही बैठाया जाता है।

जागर का आरंभ पंच नाम देवों की आरती द्वारा किया जाता है। शाम के समय जागर में महाभारत का कोई भी आख्यान प्रस्तुत किया जाता है और उसके बाद जिन देवी-देवताओं का आह्वान करना होता है उनकी गाथायें जगरियों द्वारा गायी जाती हैं। जगरिये के गायन से डंगरिये का शरीर धीरे-धीरे झूमने लगता हैं। जागर भी अपने स्वरों को बढ़ाने लगता है और इसी क्षण डंगरिये के शरीर में देवी-देवता आ जाते हैं। जगरिये द्वारा फिर से इन देवी-देवताओं की पूजा की जाती है। अब डंगरिये नाचने लगते हैं और नाचते-नाचते अपने आसन में बैठ जाते हैं। डंगरिया जगरिये को भी प्रणाम करता है। डंगरिये के समीप चाल के दाने रख दिये जाते हैं जिन्हें हाथों में लेकर डंगरिये भूतकाल, भविष्यकाल और वर्तमान के विषय में सभी बातें बताने लगते हैं।
डंगरिये से सवाल पूछने का काम उस घर के व्यक्ति करते हैं जिस घर में जागर लगायी जाती है। बाहरी व्यक्ति भी अपने सवाल इन डंगरियों से पूछते हैं। डंगरिये द्वारा सभी सवालों के जवाब दिये जाते हैं और यदि घर में किसी तरह का कष्ट है तो उसके निवारण का तरीका भी डंगरिये द्वारा ही बताया जाता है। जागर के अंत में जगरिया इन डंगरियों को कैलाश पर्वत की तरफ प्रस्थान करने को कहता है। और डंगरिया धीरे-धीरे नाचना बंद कर देता है।

जागर का आयोजन ज्यादातर चैत्र, आसाढ़, मार्गशीर्ष महीनों में किया जाता है। जागर एक, तीन और पांच रात्रि तक चलती है। सामुहिक रूप से करने पर जागर 22 दिन तक चलती है जिसे ‘बैसी’ कहा जाता है।

वैसे तो आधुनिक युग के अनुसार इन सबको अंधविश्वास ही कहा जायेगा। पर ग्रामीण इलाकों में यह परम्परा आज भी जीवित है और लोगों का मानना है कि जागर लगाने से बहुत से लोगों के कष्ट दूर हुए हैं। उन लोगों के इस अटूट विश्वास को देखते हुए इन परम्पराओं पर विश्वास करने का मन तो होता ही है।

Wednesday, 20 August 2014

देवी गिरिजा माता ! देवी गिरिजा जो गिरिराज हिमालय की पुत्री तथा संसार के पालनहार भगवान शंकर की अर्द्धागिनी हैं


रामनगर से १० कि०मी० की दूरी पर ढिकाला मार्ग पर गर्जिया नामक स्थान पर देवी गिरिजा माता के नाम से प्रसिद्ध हैं। देवी गिरिजा जो गिरिराज हिमालय की पुत्री तथा संसार के पालनहार भगवान शंकर की अर्द्धागिनी हैं, कोसी (कौशिकी) नदी के मध्य एक टीले पर यह मंदिर स्थित है। वर्ष १९४० तक इस मन्दिर के विषय में कम ही लोगों को ज्ञात था, वर्तमान में गिरिजा माता की कृपा से अनुकम्पित भक्तों की संख्या लाखों में पहुंच गई है। इस मन्दिर का व्यवस्थित तरीके से निर्माण १९७० में किया गया। जिसमें मन्दिर के वर्तमान पुजारी पं० पूर्णचंद्र पाण्डे का महत्वपूर्ण प्रयास रहा है। इस मंदिर के विषय में महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त करने के लिये इसकी ऐतिहासिक और धार्मिक पृष्ठभूमि को भी जानना आवश्यक है।

पुरातत्ववेत्ताओं का कथन है कि कूर्मांचल की सबसे प्राचीन बस्ती ढिकुली के पास थी, जहां पर वर्तमान रामनगर बसा हुआ है। कोसी के किनारे बसी इसी नगरी का नाम तब वैराट पत्तन या वैराटनगर था। कत्यूरी राजाओं के आने के पूर्व यहां पहले कुरु राजवंश के राजा राज्य करते थे, जो प्राचीन इन्द्रप्रस्थ (आधुनिक दिल्ली) के साम्राज्य की छत्रछाया में रहते थे। ढिकुली, गर्जिया क्षेत्र का लगभग ३००० वर्षों का अपना इतिहास रहा है, प्रख्यात कत्यूरी राजवंश, चंद राजवंश, गोरखा वंश और अंग्रेजी शासकों ने यहां की पवित्र भूमि का सुख भोगा है। गर्जिया नामक शक्तिस्थल सन १९४० से पहले उपेक्षित अवस्था में था, किन्तु सन १९४० से पहले की भी अनेक दन्तश्रुतियां इस स्थान का इतिहास बताती हैं। वर्ष १९४० से पूर्व इस मन्दिर की स्थिति आज की जैसी नहीं थी, कालान्तर में इस देवी को उपटा देवी (उपरद्यौं) के नाम से जाना जाता था। तत्कालीन जनमानस कीदधारणा थी कि वर्तमान गर्जिया मंदिर जिस टीले में स्थित है, वह कोसी नदी की बाढ़ में कहीं ऊपरी क्षेत्र से बहकर आ रहा था। मंदिर को टीले के साथ बहते हुये आता देख भैरव देव द्वारा उसे रोकने के प्रयास से कहा गया- “थि रौ, बैणा थि रौ। (ठहरो, बहन ठहरो), यहां पर मेरे साथ निवास करो, तभी से गर्जिया में देवी उपटा में निवास कर रही है।

लोक मान्यता है कि वर्ष १९४० से पूर्व यह क्षेत्र भयंकर जंगलों से भरा पड़ा था, सर्वप्रथम जंगलात विभाग के तत्कालीन कर्मचारियों तथा स्थानीय छुट-पुट निवासियों द्वारा टीले पर मूर्तियों को देखा और उन्हें माता जगजननी की इस स्थान पर उपस्थिति का एहसास हुआ। एकान्त सुनसान जंगली क्षेत्र, टीले के नीचे बहते कोसी की प्रबल धारा, घास-फूस की सहायता से ऊपर टीले तक चढ़ना, जंगली जानवरों की भयंकर गर्जना के बावजूद भी भक्तजन इस स्थान पर मां के दर्शनों के लिये आने लगे। जंगलात के तत्कालीन बड़े अधिकारी भी यहां पर आये, कहा जाता है कि टीले के पास मां दुर्गा का वाहन शेर भयंकर गर्जना किया करता था। कई बार शेर को इस टीले की परिक्रमा करते हुये भी लोगों द्वारा देखा गया।

भगवान शिव की अर्धांगिनि मां पार्वती का एक नाम गिरिजा भी है, गिरिराज हिमालय की पुत्री होने के कारण उन्हें इस नाम से भी बुलाया जाता है। इस मन्दिर में मां गिरिजा देवी के सतोगुणी रुप में विद्यमान है। जो सच्ची श्रद्धा से ही प्रसन्न हो जाती हैं, यहां पर जटा नारियल, लाल वस्त्र, सिन्दूर, धूप, दीप आदि चढ़ा कर वन्दना की जाती है। मनोकामना पूर्ण होने पर श्रद्धालु घण्टी या छत्र चढ़ाते हैं।  नव विवाहित स्त्रियां यहां पर आकर अटल सुहाग की कामना करती हैं। निःसंतान दंपत्ति संतान प्राप्ति के लिये माता में चरणों में झोली फैलाते हैं।

वर्तमान में इस मंदिर में गर्जिया माता की ४.५ फिट ऊंची मूर्ति स्थापित है, इसके साथ ही सरस्वती, गणेश जी तथा बटुक भैरव की संगमरमर की मूर्तियां मुख्य मूर्ति के साथ स्थापित हैं।
 इसी परिसर में एक लक्ष्मी नारायण मंदिर भी स्थापित है, इस मंदिर में स्थापित मूर्ति यहीं पर हुई खुदाई के दौरान मिली थी।

कार्तिक पूर्णिमा को गंगा स्नान के पावन पर्व पर माता गिरिजा देवी के दर्शनों एवं पतित पावनी कौशिकी (कोसी) नदी में स्नानार्थ भक्तों की भारी संख्या में भीड़ उमड़ती है। इसके अतिरिक्त गंगा दशहरा, नव दुर्गा, शिवरात्रि, उत्तरायणी, बसंत पंचमी में भी काफी संख्या में दर्शनार्थी आते हैं।

पूजा के विधान के अन्तर्गत माता गिरिजा की पूजा करने के उपरान्त बाबा भैरव ( जो माता के मूल में संस्थित है) को चावल और मास (उड़द) की दाल चढ़ाकर पूजा-अर्चना करना आवश्यक माना जाता है, कहा जाता है कि भैरव की पूजा के बाद ही मां गिरिजा देवी की पूजा का सम्पूर्ण फ्ल प्राप्त होता है।

रामनगर तक रेल और बस सेवा उपलब्ध है, उससे आगे के लिये टैक्सी आराम से मिल जाती है। रामनगर में रहने और खाने के लिये कई स्तरीय होटल उपलब्ध है। आप यहां से जिम कार्बेट पार्क भी जा सकते हैं।